Friendship Poetry (page 30)
गुंजाइश-ए-अदावत-ए-अग़्यार यक तरफ़
ग़ालिब
फ़ाएदा क्या सोच आख़िर तू भी दाना है 'असद'
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ग़ालिब
दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं
ग़ालिब
बैठा है जो कि साया-ए-दीवार-ए-यार में
ग़ालिब
आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
ग़ालिब
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ग़ालिब
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक
ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
ग़ालिब
तू दोस्त किसू का भी सितमगर न हुआ था
ग़ालिब
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
ग़ालिब
तग़ाफ़ुल-दोस्त हूँ मेरा दिमाग़-ए-अज्ज़ आली है
ग़ालिब
सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम
ग़ालिब
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
ग़ालिब
शब कि बर्क़-ए-सोज़-ए-दिल से ज़हरा-ए-अब्र आब था
ग़ालिब
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
ग़ालिब
सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर
ग़ालिब
रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमा
ग़ालिब
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
ग़ालिब
रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है
ग़ालिब
क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को
ग़ालिब
पए-नज़्र-ए-करम तोहफ़ा है शर्म-ए-ना-रसाई का
ग़ालिब
पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द
ग़ालिब
नवेद-ए-अम्न है बेदाद-ए-दोस्त जाँ के लिए
ग़ालिब
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब
ग़ालिब
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
ग़ालिब
नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में
ग़ालिब
न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त से
ग़ालिब