Friendship Poetry (page 29)
दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल अहल-ए-वफ़ा कहने लगे
ग़ुलाम हुसैन अयाज़
फिर वही हम हैं ख़याल-ए-रुख़-ए-ज़ेबा है वही
ग़ुलाम भीक नैरंग
किस तरह वाक़िफ़ हों हाल-ए-आशिक़-ए-जाँ-बाज़ से
ग़ुलाम भीक नैरंग
इक ख़लिश है मिरे बाहर मिरी दम-साज़ गिरी
ग़ुफ़रान अमजद
दिल की मिट्टी चुपके चुपके रोती है
ग़ुफ़रान अमजद
मुझे किस तरह से न हो यक़ीं कि उसे ख़िज़ाँ से गुरेज़ है
ग़ुबार भट्टी
अजब इंक़लाब का दौर है कि हर एक सम्त फ़िशार है
ग़ुबार भट्टी
मुहीत-ए-हुस्न जो अब दम-ब-दम चढ़ाव पे है
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
जाते हैं वहाँ से गर कहीं हम
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
बैठे हैं ईद को सब यार बग़ल में ले कर
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
साज़-ए-हयात क़ैद-ओ-सलासिल कहें किसे
ग़यास अंजुम
ख़ून-ए-दिल मुझ से तिरा रंग-ए-हिना माँगे है
ग़यास अंजुम
ख़सारे में रहे लेकिन न छोड़ी सादगी हम ने
ग़यास अंजुम
दिल की नय्या दो नैनों के मोह में डूबी जाए
ग़ौस सीवानी
जुनूँ में देर से ख़ुद को पुकारता हूँ मैं
ग़नी एजाज़
मुझे जो दोस्ती है उस को दुश्मनी मुझ से
ग़मगीन देहलवी
उस की सूरत का तसव्वुर दिल में जब लाते हैं हम
ग़मगीन देहलवी
शम्अ-रू आशिक़ को अपने यूँ जलाना चाहिए
ग़मगीन देहलवी
न पूछ हिज्र में जो हाल अब हमारा है
ग़मगीन देहलवी
मैं ने हर-चंद कि उस कूचे में जाना छोड़ा
ग़मगीन देहलवी
जो न वहम-ओ-गुमान में आवे
ग़मगीन देहलवी
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
ग़ालिब
ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
ग़ालिब
वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ
ग़ालिब
सँभलने दे मुझे ऐ ना-उमीदी क्या क़यामत है
ग़ालिब
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
ग़ालिब
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
ग़ालिब
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
ग़ालिब
जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलम
ग़ालिब