Heart Broken Poetry (page 125)
फिर पहाड़ों से उतर कर आएँगे
फ़ारूक़ नाज़की
मेरे चेहरे की स्याही का पता दे कोई
फ़ारूक़ नाज़की
में इक गाँव का शाएर हूँ
फ़ारूक़ नाज़की
हिसार-ए-जिस्म से आगे निकल गया होता
फ़ारूक़ नाज़की
ग़म की चादर ओढ़ कर सोए थे क्या
फ़ारूक़ नाज़की
गहरी नीली शाम का मंज़र लिखना है
फ़ारूक़ नाज़की
दर्द की रात गुज़रती है मगर आहिस्ता
फ़ारूक़ नाज़की
बस्ती से दूर जा के कोई रो रहा है क्यूँ
फ़ारूक़ नाज़की
अपनी ग़ज़ल को ख़ून का सैलाब ले गया
फ़ारूक़ नाज़की
अजीब रंग सा चेहरों पे बे-कसी का है
फ़ारूक़ नाज़की
ऐ मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ मैं
फ़ारूक़ नाज़की
ए मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ में
फ़ारूक़ नाज़की
तआ'क़ुब
फ़ारूक़ मुज़्तर
शहर
फ़ारूक़ मुज़्तर
सब्ज़ आग़ाज़ से सुर्ख़ अंजाम तक
फ़ारूक़ मुज़्तर
अंधा सफ़र
फ़ारूक़ मुज़्तर
यूँ हुजरा-ए-ख़याल में बैठा हुआ हूँ मैं
फ़ारूक़ मुज़्तर
ये गर्द-ए-राह ये माहौल ये धुआँ जैसे
फ़ारूक़ मुज़्तर
उजले माथे पे नाम लिख रक्खें
फ़ारूक़ मुज़्तर
सोच भी उस दिन को जब तू ने मुझे सोचा न था
फ़ारूक़ मुज़्तर
शफ़क़-ए-शब से उभरता हुआ सूरज सोचें
फ़ारूक़ मुज़्तर
सलीब-ए-मौजा-ए-आब-ओ-हवा पे लिक्खा हूँ
फ़ारूक़ मुज़्तर
क़ुर्बतें बढ़ गई निगाहों की
फ़ारूक़ मुज़्तर
नक़्श आख़िर आप अपना हादिसा हो जाएगा
फ़ारूक़ मुज़्तर
न पानियों का इज़्तिरार शहर में
फ़ारूक़ मुज़्तर
मैं ताइर-ए-वजूद या बर्ग-ए-ख़याल था
फ़ारूक़ मुज़्तर
मगर इन आँखों में किस सुब्ह के हवाले थे
फ़ारूक़ मुज़्तर
हर नए मोड़ धूप का सहरा
फ़ारूक़ मुज़्तर
अपनी आँखों के हिसारों से निकल कर देखना
फ़ारूक़ मुज़्तर
सितारों से शब-ए-ग़म का तो दामन जगमगा उठ्ठा
फ़ारूक़ बाँसपारी