Heart Broken Poetry (page 123)
होश ओ ख़िरद गँवा के तिरे इंतिज़ार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
बीते लम्हे कशीद करती हूँ
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
तिरे अद्ल के ऐवानों में
फर्रुख यार
रूह-ए-अस्र-ए-रवाँ
फर्रुख यार
कुश्तगान-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम-रा
फर्रुख यार
हम तो बस
फर्रुख यार
दो तहों वाली सरगोशी
फर्रुख यार
मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें
फ़र्रुख़ जाफ़री
यूँ मुसल्लत तो धुआँ जिस्म के अंदर तक है
फ़र्रुख़ जाफ़री
वो ख़ाली हाथ सफ़र-ए-आब पर रवाना हुआ
फ़र्रुख़ जाफ़री
था अबस ख़ौफ़ कि आसेब-ए-गुमाँ मैं ही था
फ़र्रुख़ जाफ़री
तमाम फेंके गए पत्थरों पे भारी था
फ़र्रुख़ जाफ़री
सोचते रहने से क्या क़िस्मत का लिक्खा जाएगा
फ़र्रुख़ जाफ़री
रौशनी से किस तरह पर्दा करेंगे
फ़र्रुख़ जाफ़री
राह-ए-गुम-कर्दा सर-ए-मंज़िल भटक कर आ गया
फ़र्रुख़ जाफ़री
मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें
फ़र्रुख़ जाफ़री
कोई मौसम हो कुछ भी हो सफ़र करना ही पड़ता है
फ़र्रुख़ जाफ़री
किसी बहाने भी दिल से अलम नहीं जाता
फ़र्रुख़ जाफ़री
ख़याल उस का कहाँ से कहाँ नहीं जाता
फ़र्रुख़ जाफ़री
कटी पहाड़ सी शब इंतिज़ार करते हुए
फ़र्रुख़ जाफ़री
जाने क्या ऐसा उसे मुझ में नज़र आया था
फ़र्रुख़ जाफ़री
इस राज़ के बातिन तक पहुँचा ही नहीं कोई
फ़र्रुख़ जाफ़री
गो इस सफ़र में थक के बदन चूर हो गया
फ़र्रुख़ जाफ़री
दिल की ये आग बुझा दी किस ने
फ़र्रुख़ जाफ़री
अबस ही महव-ए-शब-ओ-रोज़ वो दुआ में था
फ़र्रुख़ जाफ़री
वक़्त इक मौज है आता है गुज़र जाता है
फ़ारूक़ शमीम
हैं राख राख मगर आज तक नहीं बिखरे
फ़ारूक़ शमीम
धूप छूती है बदन को जब 'शमीम'
फ़ारूक़ शमीम
सिलसिले ख़्वाब के अश्कों से सँवरते कब हैं
फ़ारूक़ शमीम