Heart Broken Poetry (page 237)
मैं हज्व इक अपने हर क़सीदे की रद में तहरीर कर रहा हूँ
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ
असलम महमूद
किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया
असलम महमूद
जल रहा हूँ तो अजब रंग ओ समाँ है मेरा
असलम महमूद
हर रंग-ए-तरब मौसम ओ मंज़र से निकाला
असलम महमूद
देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश
असलम महमूद
दश्त मरऊब है कितना मिरी वीरानी से
असलम महमूद
बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ
असलम महमूद
अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे
असलम महमूद
ऐ मिरे ग़ुबार-ए-सर तू ही तो नहीं तन्हा राएगाँ तो मैं भी हूँ
असलम महमूद
जाने किस लम्हा-ए-वहशी की तलब है कि फ़लक
असलम कोलसरी
ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर
असलम कोलसरी
ज़ख़्म सहे मज़दूरी की
असलम कोलसरी
यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के
असलम कोलसरी
वही ख़्वाबीदा ख़ामोशी वही तारीक तन्हाई
असलम कोलसरी
रूठ कर निकला तो वो उस सम्त आया भी नहीं
असलम कोलसरी
रूठ कर निकला तो वो इस सम्त आया भी नहीं
असलम कोलसरी
क़रीब आ के भी इक शख़्स हो सका न मिरा
असलम कोलसरी
नज़र को वक़्फ़-ए-हैरत कर दिया है
असलम कोलसरी
जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था
असलम कोलसरी
हर-चंद बे-नवा है कोरे घड़े का पानी
असलम कोलसरी
हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं
असलम कोलसरी
दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं
असलम कोलसरी
दयार-ए-हिज्र में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हूँ
असलम कोलसरी
आरज़ू-ए-दवाम करता हूँ
असलम कोलसरी
सामने शाह-ए-वक़्त के 'असलम' कौन कहे ये बात
असलम हनीफ़
ज़ीस्त की धूप से यूँ बच के निकलता क्यूँ है
असलम हबीब
ज़ख़्मों का ब्योपारी है
असलम हबीब
सुबुक सा दर्द था उठता रहा जो ज़ख़्मों से
असलम हबीब