Heart Broken Poetry (page 236)
मैं तिरे शहर में फिरती रही मारी मारी
असरा रिज़वी
मैं सच तो कह दूँ पर उस को कहीं बुरा न लगे
असरा रिज़वी
कर्गस को सुरख़ाब बनाना चाहोगे
असरा रिज़वी
दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले
असरा रिज़वी
बे-सबब ख़ौफ़ से दिल मेरा लरज़ता क्यूँ है
असरा रिज़वी
बालीदगी-ए-ज़र्फ़ पे दिखलाए गए लोग
असरा रिज़वी
ऐसा ये दर्द है कि भुलाया न जाएगा
असरा रिज़वी
अदावतों का ये उस को सिला दिया हम ने
असरा रिज़वी
आग जो दिल में लगी है वो बुझा दी जाए
असरा रिज़वी
तेरा सूरज आएगा
असलम राशिद
सुन कर कितनी आँखें निकलीं
असलम राशिद
सूख जाता है हर शजर मुझ में
असलम राशिद
मुसलसल धूप से पाला पड़ा है
असलम राशिद
मुझे दरिया बनाना चाहती है
असलम राशिद
मिरे क़दमों में दुनिया के ख़ज़ाने हैं उठा लूँ क्या
असलम राशिद
जब उस की तस्वीर बनाई जाती है
असलम राशिद
इक क़दम उठ गया रवानी में
असलम राशिद
यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया
असलम महमूद
मिरी कहानी रक़म हुई है हवा के औराक़-ए-मुंतशिर पर
असलम महमूद
मिरे शौक़-ए-सैर-ओ-सफ़र को अब नए इक जहाँ की नुमूद कर
असलम महमूद
देख आ कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं
असलम महमूद
अब ये समझे कि अंधेरा भी ज़रूरी शय है
असलम महमूद
तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा
असलम महमूद
सराब-ए-मअनी-ओ-मफ़्हूम में भटकते हैं
असलम महमूद
सफ़र से पहले सराबों का सिलसिला रख आए
असलम महमूद
रंग सारे अपने अंदर रफ़्तगाँ के हैं
असलम महमूद
पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है
असलम महमूद
नए पैकर नए साँचे में ढलना चाहता हूँ मैं
असलम महमूद
न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के
असलम महमूद
मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है
असलम महमूद