Hope Poetry (page 116)

ऐसी ख़्वाहिश को समझता हूँ मैं बिल्कुल नेचुरल

अज़ीज़ फ़ैसल

उमीद

अज़ीज़ फ़ैसल

मैं रौशनी हूँ तो मेरी पहुँच कहाँ तक है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा सी देर में वो जाने क्या से क्या कर दे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

न याद आया न भूला न सानेहा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मैं उस की बात के लहजे का ए'तिबार करूँ

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम कोई नादान नहीं कि बच्चों की सी बात करें

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हटा के मेज़ से इक रोज़ आईना मैं ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूल जो दिल की रहगुज़र में है

अज़ीज़ अन्सारी

कुछ ज़िंदगी में इश्क़-ओ-वफ़ा का हुनर भी रख

अज़ीज़ अन्सारी

ख़ाक ओ ख़ला का हिसार और मैं

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

ख़्वाहिश-ओ-ख़ाब के आगे भी कहीं जाना है

अज़ीम हैदर सय्यद

मआल-ए-दोस्ती कहिए हदीस-ए-मह-वशाँ कहिए

अज़हर सईद

न जाने शाम ने क्या कह दिया सवेरे से

अज़हर नवाज़

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

दर-पेश नहीं नक़्ल-ए-मकानी कई दिन से

अज़हर नक़वी

मिरी दुनिया अकेली हो रही है

अज़हर नैयर

मैं महल रेत के सहरा में बनाने बैठा

अज़हर नैयर

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के

अज़हर नैयर

हैरान हूँ कि आज ये क्या हादिसा हुआ

अज़हर नैयर