Hope Poetry (page 117)

ये मोहब्बत का फ़साना भी बदल जाएगा

अज़हर लखनवी

तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले

अज़हर जावेद

तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती

अज़हर इक़बाल

फिर इस के बाद मनाया न जश्न ख़ुश्बू का

अज़हर इक़बाल

वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया

अज़हर इक़बाल

मुझ को वहशत हुई मिरे घर से

अज़हर इक़बाल

हुई न ख़त्म तेरी रहगुज़ार क्या करते

अज़हर इक़बाल

घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए

अज़हर इक़बाल

दिल की गली में चाँद निकलता रहता है

अज़हर इक़बाल

ये और बात कि आँधी हमारे बस में नहीं

अज़हर इनायती

पलट चलें कि ग़लत आ गए हमीं शायद

अज़हर इनायती

घर से किस तरह मैं निकलूँ कि ये मद्धम सा चराग़

अज़हर इनायती

आज भी शाम-ए-ग़म! उदास न हो

अज़हर इनायती

तिरे तक़ाज़ों पे चेहरे बदल रहा हूँ मैं

अज़हर इनायती

रंगतें मासूम चेहरों की बुझा दी जाएँगी

अज़हर इनायती

क्या क्या नवाह-ए-चश्म की रानाइयाँ गईं

अज़हर इनायती

कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं

अज़हर इनायती

जाने आया था क्यूँ मकान से मैं

अज़हर इनायती

इस हादसे को देख के आँखों में दर्द है

अज़हर इनायती

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए

अज़हर इनायती

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

बनाए ज़ेहन परिंदों की ये क़तार मिरा

अज़हर इनायती

अभी बिछड़ा है वो कुछ रोज़ तो याद आएगा

अज़हर इनायती

ये कम नहीं के वही शाम का सितारा है

अज़हर हाश्मी

वफ़ा ख़ुलूस का सिंगार रोज़ करती है

अज़हर हाश्मी

शहर को आतिश-ए-रंजिश के धुआँ तक देखूँ

अज़हर हाश्मी

मिरे वजूद का मेहवर चमकता रहता है

अज़हर हाश्मी

ख़्वाबों का इंतिख़ाब बदलता दिखाई दे

अज़हर हाश्मी

ख़ामोश ज़बाँ से जब तक़रीर निकलती है

अज़हर हाश्मी

जफ़ाओं की नुमाइश है किसी से कुछ नहीं बोलें

अज़हर हाश्मी