Hope Poetry (page 119)
ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक
अज़ीम मुर्तज़ा
फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है
अज़ीम मुर्तज़ा
फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले
अज़ीम मुर्तज़ा
रस्म-ए-अंदेशा से फ़ारिग़ हुए हम
आज़र तमन्ना
यक़ीं बनाता है कोई गुमाँ बनाता है
आज़र तमन्ना
इस तरह फूँक मेरा गुलिस्तान-ए-आरज़ू
आज़म चिश्ती
दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके
आज़म चिश्ती
पेड़ आँगन के तिरे जब बारवर हो जाएँगे
आज़ाद गुरदासपुरी
वक़्त का ये मोड़ कैसा है कि तुझ से मिल के भी
आज़ाद गुलाटी
उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया
आज़ाद गुलाटी
तुम्हें भी मुझ में न शायद वो पहली बात मिले
आज़ाद गुलाटी
शायद तुम भी अब न मुझे पहचान सको
आज़ाद गुलाटी
वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा
आज़ाद गुलाटी
तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है
आज़ाद गुलाटी
तेरे क़दमों की आहट को तरसा हूँ
आज़ाद गुलाटी
रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
आज़ाद गुलाटी
मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है
आज़ाद गुलाटी
ख़ला-ए-ज़ेहन के गुम्बद में गूँजता हूँ मैं
आज़ाद गुलाटी
कर्ब हरे मौसम का तब तक सहना पड़ता है
आज़ाद गुलाटी
हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ
आज़ाद गुलाटी
हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था
आज़ाद गुलाटी
डूब कर ख़ुद में कभी यूँ बे-कराँ हो जाऊँगा
आज़ाद गुलाटी
अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया
आज़ाद गुलाटी
सितम-दोस्त फ़िक्र-ए-अदावत कहाँ तक
आज़ाद अंसारी
हक़ बना बातिल बना नाक़िस बना कामिल बना
आज़ाद अंसारी
इबारतें चमक रही हैं दिल में तेरे प्यार की
आयुष चराग़
डराने वाला सुन कर डर रहा है
आयुष चराग़
कुछ और हो भी तो राएगाँ है
अय्यूब ख़ावर
उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं
अय्यूब ख़ावर
सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया
अय्यूब ख़ावर