Hope Poetry (page 120)
न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है
अय्यूब ख़ावर
न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है
अय्यूब ख़ावर
कोई न देखे गूँज हवा की
अय्यूब ख़ावर
हवा के रुख़ पे रह-ए-ए'तिबार में रक्खा
अय्यूब ख़ावर
इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के
अय्यूब ख़ावर
चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी
अय्यूब ख़ावर
बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना
अय्यूब ख़ावर
बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे
अय्यूब ख़ावर
आ जाए न रात कश्तियों में
अय्यूब ख़ावर
उस ने हमारे हाथ में इक हाथ क्या दिया
आएशा मसूद मलिक
दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं
अयाज़ झाँसवी
ये बातों ही बातों में बातें बदलना
औरंगज़ेब
ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से
औरंगज़ेब
अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया
औरंगज़ेब
आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है
औरंगज़ेब
आइना है ख़याल की हैरत
औरंगज़ेब
आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर
औरंगज़ेब
शिकस्ता-दिल की ख़ुशी दोस्तो ख़ुशी तो न थी
औलाद अली रिज़वी
न पूछो कैसे शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
औलाद अली रिज़वी
जहाँ निफ़ाक़ के शो'ले मिलें बुझा के चलो
औलाद अली रिज़वी
ख़्वाहिशें दुनिया की बार-ए-दोश-ओ-गर्दन हो गईं
औज लखनवी
चार-सू आलम-ए-इम्काँ में अँधेरा देखा
औज लखनवी
ज़रा से रिज़्क़ में बरकत भी कितनी होती थी
अतीक़ुल्लाह
मुझ में ख़ुद मेरी अदम-मौजूदगी शामिल रही
अतीक़ुल्लाह
फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई
अतीक़ुल्लाह
मैं कि तुम पे बाज़ हूँ
अतीक़ुल्लाह
कितना मुश्किल है
अतीक़ुल्लाह
हमारे मा-बैन
अतीक़ुल्लाह
मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था
अतीक़ुल्लाह
कुछ और दिन अभी उस जा क़याम करना था
अतीक़ुल्लाह