Hope Poetry (page 43)
हर-गाम पर थे शम्स-ओ-क़मर उस दयार में
हबीब जालिब
गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है
हबीब जालिब
ग़ज़लें तो कही हैं कुछ हम ने उन से न कहा अहवाल तो क्या
हबीब जालिब
ग़ज़लें तो कही हैं कुछ हम ने उन से न कहा अहवाल तो क्या
हबीब जालिब
दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है
हबीब जालिब
दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले
हबीब जालिब
भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
बहुत रौशन है शाम-ए-ग़म हमारी
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़ सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मिरी जाँ
हबीब जालिब
आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह
हबीब जालिब
मय-कदे को जा के देख आऊँ ये हसरत दिल में है
हबीब मूसवी
मय-कदा है शैख़ साहब ये कोई मस्जिद नहीं
हबीब मूसवी
गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट
हबीब मूसवी
दिल में भरी है ख़ाक में मिलने की आरज़ू
हबीब मूसवी
दश्त-ओ-सहरा में हसीं फिरते हैं घबराए हुए
हबीब मूसवी
वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए
हबीब मूसवी
शराब पी जान तन में आई अलम से था दिल कबाब कैसा
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले
हबीब मूसवी
हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
हबीब मूसवी
है निगहबाँ रुख़ का ख़ाल-रू-ए-दोस्त
हबीब मूसवी
है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़
हबीब मूसवी
गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट
हबीब मूसवी
फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है
हबीब मूसवी
फ़रियाद भी मैं कर न सका बे-ख़बरी से
हबीब मूसवी
दाग़-ए-दिल हैं ग़ैरत-ए-सद-लाला-ज़ार अब के बरस
हबीब मूसवी
भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा
हबीब मूसवी
बना के आईना-ए-तसव्वुर जहाँ दिल-ए-दाग़-दार देखा
हबीब मूसवी