Hope Poetry (page 45)
तमाम रात बुझेंगे न मेरे घर के चराग़
हबाब तिर्मिज़ी
उमीद-ओ-बीम के आलम में दिल दहलता है
हबाब हाश्मी
ख़ुद पे वो फ़ख़्र-कुनाँ कैसा है
हबाब हाश्मी
अब तलक तुंद हवाओं का असर बाक़ी है
हबाब हाश्मी
तिश्ना-ए-तकमील है वहशत का अफ़्साना अभी
ग्यान चन्द मंसूर
क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है
ग्यान चन्द
क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है
ग्यान चन्द
जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों ज़ब्ह होती हो
गुलज़ार देहलवी
उस सितमगर की मेहरबानी से
गुलज़ार देहलवी
उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है
गुलज़ार देहलवी
फ़लाह-ए-आदमियत में सऊबत सह के मर जाना
गुलज़ार देहलवी
ज़ाहिर मुसाफ़िरों का हुनर हो नहीं रहा
गुलज़ार बुख़ारी
उस का चेहरा भी चमक में न मिसाली निकला
गुलज़ार बुख़ारी
तिरी उमीदों का साथ देगी इनायत-ए-बर्ग-ओ-बार कब तक
गुलज़ार बुख़ारी
कितनी सदियाँ ना-रसी की इंतिहा में खो गईं
गुलज़ार बुख़ारी
राख को भी कुरेद कर देखो
गुलज़ार
रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे
गुलज़ार
काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं
गुलज़ार
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं
गुलज़ार
अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
गुलज़ार
आदतन तुम ने कर दिए वादे
गुलज़ार
सिद्धार्थ की एक रात
गुलज़ार
किताबें
गुलज़ार
ख़ुदा
गुलज़ार
ख़ाना-ब-दोश
गुलज़ार
हिरासत
गुलज़ार
एक और रात
गुलज़ार
बोसकी
गुलज़ार
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें
गुलज़ार
वो ख़त के पुर्ज़े उड़ा रहा था
गुलज़ार