Hope Poetry (page 46)
सब्र हर बार इख़्तियार किया
गुलज़ार
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर
गुलज़ार
मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता
गुलज़ार
कोई अटका हुआ है पल शायद
गुलज़ार
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
गुलज़ार
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे
गुलज़ार
जब भी आँखों में अश्क भर आए
गुलज़ार
हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है
गुलज़ार
गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं
गुलज़ार
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
गुलज़ार
दिखाई देते हैं धुँद में जैसे साए कोई
गुलज़ार
बीते रिश्ते तलाश करती है
गुलज़ार
ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता
गुलज़ार
याद नहीं है
गुलनाज़ कौसर
किसी की याद का चेहरा
गुलनाज़ कौसर
ये तिलिस्म-ए-मौसम-ए-गुल नहीं कि ये मोजज़ा है बहार का
गुलनार आफ़रीन
वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा
गुलनार आफ़रीन
सफ़र का रंग हसीं क़ुर्बतों का हामिल हो
गुलनार आफ़रीन
किन शहीदों के लहू के ये फ़रोज़ाँ हैं चराग़
गुलनार आफ़रीन
याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था
गुलनार आफ़रीन
वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा
गुलनार आफ़रीन
शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है
गुलनार आफ़रीन
शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई
गुलनार आफ़रीन
न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा
गुलनार आफ़रीन
न पूछ ऐ मिरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी
गुलनार आफ़रीन
हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए
गुलनार आफ़रीन
दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए
गुलनार आफ़रीन
आँख में अश्क लिए ख़ाक लिए दामन में
गुलनार आफ़रीन
बहार इस धूम से आई गई उम्मीद जीने की
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
आज़ुर्दा कुछ हैं शायद वर्ना हुज़ूर मुझ से
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी