Hope Poetry (page 48)

भूला है बा'द-ए-मर्ग मुझे दोस्त याँ तलक

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

अपना हर उज़्व चश्म-ए-बीना है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

शेर जब खुलता है खुलते हैं मआनी क्या क्या

गोविन्द गुलशन

सँभल के रहिएगा ग़ुस्से में चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन

आप जब चेहरा बदल कर आ गए

गोविन्द गुलशन

फिर मुझे जीने की दुआ दी है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

जब मिली उन से नज़र मिटने का सामाँ हो गया

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

गिला क्या करूँ ऐ फ़लक बता मिरे हक़ में जब ये जहाँ नहीं

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बहुत वाक़िफ़ हैं लब-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ से

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बात कुछ भी न थी फ़साना हुआ

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

है बहुत अँधियार अब सूरज निकलना चाहिए

गोपालदास नीरज

मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले

गोपाल मित्तल

क्या कीजिए कशिश है कुछ ऐसी गुनाह में

गोपाल मित्तल

सुब्ह-ए-काज़िब

गोपाल मित्तल

शब-ताब

गोपाल मित्तल

नज़्म

गोपाल मित्तल

कि दर गुफ़्तन नमी आयद

गोपाल मित्तल

एक हुस्न-फ़रोश लड़की के नाम

गोपाल मित्तल

उस ने माइल-ब-करम हो के बुलाया है मुझे

गोपाल मित्तल

तेरा ख़ुलूस-ए-दिल तो महल्ल-ए-नज़र नहीं

गोपाल मित्तल

शे'र कहने का मज़ा है अब तो

गोपाल मित्तल

फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए

गोपाल मित्तल

किस को है हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद का दावा देखें

गोपाल मित्तल

कज-कुलाही की अदा याद आई

गोपाल मित्तल

जो शुआ-ए-लब है मौज-ए-नौ-बहार-ए-नग़्मा है

गोपाल मित्तल

फ़क़त इक शग़्ल बेकारी है अब बादा-कशी अपनी

गोपाल मित्तल

दौर-ए-फ़लक के शिकवे गिले रोज़गार के

गोपाल मित्तल

अगरचे बे-हिसी-ए-दिल मुझे गवारा नहीं

गोपाल मित्तल

रह गई लुट कर बहार-ए-ज़िंदगी

गोपाल कृष्णा शफ़क़

हर घड़ी बीमार हो कर रह गई

गोपाल कृष्णा शफ़क़