Hope Poetry (page 50)
रात का हर इक मंज़र रंजिशों से बोझल था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
मिलने की हर आस के पीछे अन-देखी मजबूरी थी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
लब पे सुर्ख़ी की जगह जो मुस्कुराहट मल रहे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कुछ बे-तरतीब सितारों को पलकों ने किया तस्ख़ीर तो क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़ामोश थे तुम और बोलता था बस एक सितारा आँखों में
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जज़्बों को किया ज़ंजीर तो क्या तारों को किया तस्ख़ीर तो क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बयाबाँ दूर तक मैं ने सजाया था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बन से फ़सील-ए-शहर तक कोई सवार भी नहीं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अपने अशआर को रुस्वा सर-ए-बाज़ार करूँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अक्स की सूरत दिखा कर आप का सानी मुझे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तिरी नवेद में हर दास्ताँ को सुनते हैं
ग़ुलाम मौला क़लक़
न ये है न वो है न मैं हूँ न तू है
ग़ुलाम मौला क़लक़
न हो आरज़ू कुछ यही आरज़ू है
ग़ुलाम मौला क़लक़
मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
ग़ुलाम मौला क़लक़
दयार-ए-यार का शायद सुराग़ लग जाता
ग़ुलाम मौला क़लक़
अश्क के गिरते ही आँखों में अंधेरा छा गया
ग़ुलाम मौला क़लक़
ज़िंदगी मर्ग की मोहलत ही सही
ग़ुलाम मौला क़लक़
वही वा'दा है वही आरज़ू वही अपनी उम्र-ए-तमाम है
ग़ुलाम मौला क़लक़
उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं
ग़ुलाम मौला क़लक़
उन से कहा कि सिद्क़-ए-मोहब्बत मगर दरोग़
ग़ुलाम मौला क़लक़
उड़ाऊँ न क्यूँ तार-तार-ए-गरेबाँ
ग़ुलाम मौला क़लक़
तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़
ग़ुलाम मौला क़लक़
थक थक गए हैं आशिक़ दरमांदा-ए-फ़ुग़ाँ हो
ग़ुलाम मौला क़लक़
तेरे दर पर मक़ाम रखते हैं
ग़ुलाम मौला क़लक़
रिश्ता-ए-रस्म-ए-मोहब्बत मत तोड़
ग़ुलाम मौला क़लक़