Hope Poetry (page 49)

बात अपनों की करूँ मैं किसी बेगाने से

गोपाल कृष्णा शफ़क़

आँखों में नए रंग सजाने नहीं उतरे

गिरिजा व्यास

दिए से लौ नहीं पिंदार ले कर जा रही है

ग़ज़ाला शाहिद

ये लोग किस की तरफ़ देखते हैं हसरत से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

कुछ ऐसे देखता है वो मुझे कि लगता है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

दिल ने तमन्ना की थी जिस की बरसों तक

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

अपनी तस्वीर के इक रुख़ को निहाँ रखता है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

उबल पड़ा यक-ब-यक समुंदर तो मैं ने देखा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

ठहर ठहर के मिरा इंतिज़ार करता चल

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मिली राह वो कि फ़रार का न पता चला

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मिरी गिरफ़्त में है ताएर-ए-ख़याल मिरा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मेरे लब तक जो न आई वो दुआ कैसी थी

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मौजूदगी का उस की असर होने लगा है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

कहने सुनने का अजब दोनों तरफ़ जोश रहा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बढ़ा जब उस की तवज्जोह का सिलसिला कुछ और

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

उम्मीद की सूखती शाख़ों से सारे पत्ते झड़ जाएँगे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हर साल बहार से पहले मैं पानी पर फूल बनाता हूँ

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

आया है इक राह-नुमा के इस्तिक़बाल को इक बच्चा

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

ज़िंदगी

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

समीता-पाटिल

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कहफ़-उल-क़हत

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

एक ज़ाती नज़्म

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

दुआ और बद-दुआ के दरमियाँ

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

वो बे-दिली में कभी हाथ छोड़ देते हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सोते हैं वो आईना ले कर ख़्वाबों में बाल बनाते हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सोए हुए जज़्बों को जगाना ही नहीं था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

रात उस के सामने मेरे सिवा भी मैं ही था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर