Hope Poetry (page 53)
अगर ये रंगीनी-ए-जहाँ का वजूद है अक्स-ए-आसमाँ से
ग़ुलाम हुसैन साजिद
अभी शब है मय-ए-उल्फ़त उण्डेलें
ग़ुलाम हुसैन साजिद
आज आईने में जो कुछ भी नज़र आता है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
आइने में अक्स खिलता है गुल-ए-हैरत नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
आइना-आसा ये ख़्वाब-ए-नीलमीं रक्खूँगा मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
फ़सील-ए-जिस्म की ऊँचाई से उतर जाएँ
ग़ुलाम हुसैन अयाज़
मक़्सूद-ए-उल्फ़त
ग़ुलाम भीक नैरंग
फिर वही हम हैं ख़याल-ए-रुख़-ए-ज़ेबा है वही
ग़ुलाम भीक नैरंग
कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती
ग़ुलाम भीक नैरंग
कभी सूरत जो मुझे आ के दिखा जाते हो
ग़ुलाम भीक नैरंग
ज़बाँ साकित हो क़त-ए-गुफ़्तुगू हो
ग़ुबार भट्टी
तिरा मय-ख़्वार ख़ुश-आग़ाज़-ओ-ख़ुश-अंजाम है साक़ी
ग़ुबार भट्टी
तसल्ली को हमारी बाग़बाँ कुछ और कहता है
ग़ुबार भट्टी
मुझे किस तरह से न हो यक़ीं कि उसे ख़िज़ाँ से गुरेज़ है
ग़ुबार भट्टी
मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई
ग़ुबार भट्टी
जल्वा-ए-हुस्न अगर ज़ीनत-ए-काशाना बने
ग़ुबार भट्टी
ज़मीं की हद अगर कोई नहीं है
गाैस मथरावी
मुहीत-ए-हुस्न जो अब दम-ब-दम चढ़ाव पे है
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
जाते हैं वहाँ से गर कहीं हम
ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र
ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ
ग़ज़नफ़र
यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है
ग़ज़नफ़र
तारीकी में नूर का मंज़र सूरज में शब देखोगे
ग़ज़नफ़र
ज़मीं के साथ फ़लक के सफ़र में हम भी हैं
ग़यास मतीन
जज़ीरे हों कि वो सहरा हों ख़्वाब होना है
ग़यास मतीन
साज़-ए-हयात क़ैद-ओ-सलासिल कहें किसे
ग़यास अंजुम
ख़ून-ए-दिल मुझ से तिरा रंग-ए-हिना माँगे है
ग़यास अंजुम
ख़सारे में रहे लेकिन न छोड़ी सादगी हम ने
ग़यास अंजुम
छुपा है कर्ब-ए-मुसलसल हवा के लहजे में
ग़यास अंजुम
बे-नियाज़-ए-बहार सा क्यूँ है
ग़यास अंजुम
मुंतज़िर
ग़ौसिया ख़ान सबीन