Hope Poetry (page 54)

चल दिया नाज़ ज़माने के उठाने वाला

ग़ौसिया ख़ान सबीन

अभी देखी कहाँ हैं आप ने सब ख़ूबियाँ मेरी

ग़ौसिया ख़ान सबीन

आँधी में भी चराग़ मगन है सबा के साथ

ग़ौसिया ख़ान सबीन

दिल की नय्या दो नैनों के मोह में डूबी जाए

ग़ौस सीवानी

तुम्हें ख़बर भी है ये तुम ने किस से क्या माँगा

ग़नी एजाज़

ख़्वाहिशें अपनी सराबों में न रक्खे कोई

ग़नी एजाज़

जुनूँ में देर से ख़ुद को पुकारता हूँ मैं

ग़नी एजाज़

बेवफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं

ग़नी एजाज़

अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा

ग़नी एजाज़

आदमी की हयात मुट्ठी भर

ग़नी एजाज़

मेरी ये आरज़ू है वक़्त-ए-मर्ग

ग़मगीन देहलवी

उस के कूचे में गया मैं सो फिर आया न गया

ग़मगीन देहलवी

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

न पूछ हिज्र में जो हाल अब हमारा है

ग़मगीन देहलवी

जो न वहम-ओ-गुमान में आवे

ग़मगीन देहलवी

अक्स की कहानी का इक़्तिबास हम ही थे

ग़ालिब इरफ़ान

भले ही छाँव न दे आसरा तो देता है

ग़ालिब अयाज़

कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा

ग़ालिब अयाज़

जहाँ ख़राब सही हम बदन-दरीदा सही

ग़ालिब अयाज़

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना

ग़ालिब अयाज़

हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए

ग़ालिब अयाज़

बस तेरे लिए उदास आँखें

ग़ालिब अयाज़

सदा ब-सहरा

ग़ालिब अहमद

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

ग़ालिब

तू ने क़सम मय-कशी की खाई है 'ग़ालिब'

ग़ालिब

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना

ग़ालिब

तमाशा कि ऐ महव-ए-आईना-दारी

ग़ालिब

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी

ग़ालिब

फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

ग़ालिब

ना-कर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद

ग़ालिब