Hope Poetry (page 55)
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा
ग़ालिब
न लुटता दिन को तो कब रात को यूँ बे-ख़बर सोता
ग़ालिब
मुनहसिर मरने पे हो जिस की उमीद
ग़ालिब
मरते मरते देखने की आरज़ू रह जाएगी
ग़ालिब
मरते हैं आरज़ू में मरने की
ग़ालिब
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
ग़ालिब
मैं भला कब था सुख़न-गोई पे माइल 'ग़ालिब'
ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती
ग़ालिब
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग
ग़ालिब
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
ग़ालिब
जब तवक़्क़ो ही उठ गई 'ग़ालिब'
ग़ालिब
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ग़ालिब
जान तुम पर निसार करता हूँ
ग़ालिब
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
ग़ालिब
हुई जिन से तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले
ग़ालिब
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
ग़ालिब
है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब
ग़ालिब
घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना
ग़ालिब
दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके
ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
ग़ालिब
बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल
ग़ालिब
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
ग़ालिब
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
ग़ालिब
आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता
ग़ालिब
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ग़ालिब
ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं
ग़ालिब
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
ग़ालिब