Islamic Poetry (page 17)
जवानी के तराने गा रहा हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ ने हुस्न की बे-दाद पे रोना चाहा
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ के हाथों ये सारी आलम-आराई हुई
हफ़ीज़ जालंधरी
इन तल्ख़ आँसुओं को न यूँ मुँह बना के पी
हफ़ीज़ जालंधरी
इन गेसुओं में शाना-ए-अरमाँ न कीजिए
हफ़ीज़ जालंधरी
हैरान न हो देख मैं क्या देख रहा हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
दोस्ती का चलन रहा ही नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल-ए-बे-मुद्दआ है और मैं हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल से तिरा ख़याल न जाए तो क्या करूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
ऐ दोस्त मिट गया हूँ फ़ना हो गया हूँ मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
अगर मौज है बीच धारे चला चल
हफ़ीज़ जालंधरी
आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी
आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने
हफ़ीज़ जालंधरी
राज़-ए-सर-बस्ता मोहब्बत के ज़बाँ तक पहुँचे
हफ़ीज़ होशियारपुरी
न पूछ क्यूँ मिरी आँखों में आ गए आँसू
हफ़ीज़ होशियारपुरी
कहाँ कहाँ न तसव्वुर ने दाम फैलाए
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ये और बात कि लहजा उदास रखते हैं
हफ़ीज़ बनारसी
लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है
हफ़ीज़ बनारसी
ख़फ़ा है गर ये ख़ुदाई तो फ़िक्र ही क्या है
हफ़ीज़ बनारसी
जो ख़त है शिकस्ता है जो अक्स है टूटा है
हफ़ीज़ बनारसी
हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है
हफ़ीज़ बनारसी
आ जाओ कि मिल कर हम जीने की बिना डालें
हफ़ीज़ बनारसी
तू है बहार तो दामन मिरा हो क्यूँ ख़ाली
हादी मछलीशहरी
ज़बाँ पे हर्फ़-ए-शिकायत अरे मआज़-अल्लाह
हादी मछलीशहरी
तुम्हें भी मालूम हो हक़ीक़त कुछ अपनी रंगीं-अदाइयों की
हादी मछलीशहरी
तू न हो हम-नफ़स अगर जीने का लुत्फ़ ही नहीं
हादी मछलीशहरी
हज़ार ख़ाक के ज़र्रों में मिल गया हूँ मैं
हादी मछलीशहरी
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
हबीब जालिब