Islamic Poetry (page 18)
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
हबीब जालिब
मुशीर
हबीब जालिब
मौलाना
हबीब जालिब
ख़ुदा हमारा है
हबीब जालिब
अहद-ए-सज़ा
हबीब जालिब
यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त-ओ-गरेबाँ यारो
हबीब जालिब
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
हबीब जालिब
न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में
हबीब जालिब
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने
हबीब जालिब
कराहते हुए इंसान की सदा हम हैं
हबीब जालिब
हम ने दिल से तुझे सदा माना
हबीब जालिब
ख़ुदा करे कहीं मय-ख़ाने की तरफ़ न मुड़े
हबीब मूसवी
कसी हैं भब्तियाँ मस्जिद में रीश-ए-वाइज़ पर
हबीब मूसवी
दिल लिया है तो ख़ुदा के लिए कह दो साहब
हबीब मूसवी
बहुत दिनों में वो आए हैं वस्ल की शब है
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
सब में हूँ फिर किसी से सरोकार भी नहीं
हबीब मूसवी
जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा
हबीब मूसवी
हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
हबीब मूसवी
है निगहबाँ रुख़ का ख़ाल-रू-ए-दोस्त
हबीब मूसवी
है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है
हबीब मूसवी
है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़
हबीब मूसवी
फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है
हबीब मूसवी
भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा
हबीब मूसवी
बढ़ा दी इक नज़र में तू ने क्या तौक़ीर पत्थर की
हबीब मूसवी
अक़्ल पर पत्थर पड़े उल्फ़त में दीवाना हुआ
हबीब मूसवी
ये कैफ़ कैफ़-ए-मोहब्बत है कोई क्या जाने
हबीब अशअर देहलवी
कितने सनम ख़ुद हम ने तराशे
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
न बेताबी न आशुफ़्ता-सरी है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
मुझ को दिमाग़-ए-शेवन-ओ-आह-ओ-फ़ुग़ाँ नहीं
हबीब अहमद सिद्दीक़ी