Islamic Poetry (page 20)

किस क़दर मुझ को ना-तवानी है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

हसरत ऐ जाँ शब-ए-जुदाई है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

भूला है बा'द-ए-मर्ग मुझे दोस्त याँ तलक

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

अपना हर उज़्व चश्म-ए-बीना है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

मिरी आह-ओ-फ़ुग़ाँ कुछ भी नहीं है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बहुत वाक़िफ़ हैं लब-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ से

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

ख़ुदा गवाह कि दोनों हैं दुश्मन-ए-परवाज़

गोपाल मित्तल

फ़ितरत में आदमी की है मुबहम सा एक ख़ौफ़

गोपाल मित्तल

नज़्म

गोपाल मित्तल

नज़्म

गोपाल मित्तल

रंगीनी-ए-हवस का वफ़ा नाम रख दिया

गोपाल मित्तल

फ़क़त इक शग़्ल बेकारी है अब बादा-कशी अपनी

गोपाल मित्तल

अगरचे बे-हिसी-ए-दिल मुझे गवारा नहीं

गोपाल मित्तल

रह गई लुट कर बहार-ए-ज़िंदगी

गोपाल कृष्णा शफ़क़

क्या बताऊँ आज वो मुझ से जुदा क्यूँकर हुआ

गोपाल कृष्णा शफ़क़

मेरे लब तक जो न आई वो दुआ कैसी थी

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

तज़ाद

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

एक ज़ाती नज़्म

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

शौक़ बरहना-पा चलता था और रस्ते पथरीले थे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हम ने तो बे-शुमार बहाने बनाए हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

पड़ा है दैर-ओ-काबा में ये कैसा ग़ुल ख़ुदा जाने

ग़ुलाम मौला क़लक़

क्यूँकर न आस्तीं में छुपा कर पढ़ें नमाज़

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न करते हम

ग़ुलाम मौला क़लक़

जबीन-ए-पारसा को देख कर ईमाँ लरज़ता है

ग़ुलाम मौला क़लक़

तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं

ग़ुलाम मौला क़लक़

राज़-ए-दिल दोस्त को सुना बैठे

ग़ुलाम मौला क़लक़

पी भी ऐ माया-ए-शबाब शराब

ग़ुलाम मौला क़लक़

कोई कैसा ही साबित हो तबीअ'त आ ही जाती है

ग़ुलाम मौला क़लक़