Islamic Poetry (page 21)

ख़ुशी में भी नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ हूँ

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुद देख ख़ुदी को ओ ख़ुद-आरा

ग़ुलाम मौला क़लक़

कहिए क्या और फ़ैसले की बात

ग़ुलाम मौला क़लक़

जौहर-ए-आसमाँ से क्या न हुआ

ग़ुलाम मौला क़लक़

हर अदावत की इब्तिदा है इश्क़

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ सितम-आज़मा जफ़ा कब तक

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ ख़ार ख़ार-ए-हसरत क्या क्या फ़िगार हैं हम

ग़ुलाम मौला क़लक़

नुमूद पाते हैं मंज़रों की शिकस्त से फ़तह के बहाने

ग़ुलाम हुसैन साजिद

मिरे पहलू से जो निकले वो मिरी जाँ हो कर

ग़ुलाम भीक नैरंग

इक हुजूम-ए-ग़म-ओ-कुलफ़त है ख़ुदा ख़ैर करे

ग़ुलाम भीक नैरंग

पुराने जूते

ग़ुलाम अहमद फ़रीद

ज़बाँ साकित हो क़त-ए-गुफ़्तुगू हो

ग़ुबार भट्टी

तिरा मय-ख़्वार ख़ुश-आग़ाज़-ओ-ख़ुश-अंजाम है साक़ी

ग़ुबार भट्टी

तसल्ली को हमारी बाग़बाँ कुछ और कहता है

ग़ुबार भट्टी

जल्वा-ए-हुस्न अगर ज़ीनत-ए-काशाना बने

ग़ुबार भट्टी

क़ल्ब-ओ-नज़र के सिलसिले मेरी निगाह में रहे

गाैस मथरावी

आँधी में भी चराग़ मगन है सबा के साथ

ग़ौसिया ख़ान सबीन

तुम्हें ख़बर भी है ये तुम ने किस से क्या माँगा

ग़नी एजाज़

थकन ग़ालिब है दम टूटे हुए हैं

ग़नी एजाज़

जुनूँ में देर से ख़ुद को पुकारता हूँ मैं

ग़नी एजाज़

कोई समझाओ उन्हें बहर-ए-ख़ुदा ऐ मोमिनो

ग़मगीन देहलवी

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

मुझ से आज़ुर्दा जो उस गुल-रू को अब पाते हैं लोग

ग़मगीन देहलवी

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'

ग़ालिब

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है

ग़ालिब

सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ़ सब दुरुस्त

ग़ालिब

शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश

ग़ालिब

सादिक़ हूँ अपने क़ौल का 'ग़ालिब' ख़ुदा गवाह

ग़ालिब

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'

ग़ालिब

फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

ग़ालिब