Islamic Poetry (page 23)
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
ग़ालिब
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
ग़ालिब
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं
ग़ालिब
है सब्ज़ा-ज़ार हर दर-ओ-दीवार-ए-ग़म-कदा
ग़ालिब
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ग़ालिब
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
ग़ालिब
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
ग़ालिब
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
ग़ालिब
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
ग़ालिब
बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए
ग़ालिब
बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है
ग़ालिब
अजब नशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे
ग़ालिब
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ग़ालिब
जहाँ में ज़र का है कारख़ाना न कोई अपना न है यगाना
जोर्ज पेश शोर
यहाँ कौन इस के सिवा रह गया
गौहर होशियारपुरी
है जो भी जज़ा सज़ा अता हो
गौहर होशियारपुरी
सुब्ह हैं सज्दे में हम तो शाम साक़ी के हुज़ूर
गणेश बिहारी तर्ज़
दोस्ती अपनी जगह और दुश्मनी अपनी जगह
गणेश बिहारी तर्ज़
दोस्ती अपनी जगह और दुश्मनी अपनी जगह
गणेश बिहारी तर्ज़
चमकते चाँद से चेहरों के मंज़र से निकल आए
फ़ुज़ैल जाफ़री
क़दम क़दम पे हैं बिखरी हक़ीक़तें क्या क्या
फ़ुज़ैल जाफ़री
निभेगी किस तरह दिल सोचता है
फ़ुज़ैल जाफ़री
दिलों के आइने धुँदले पड़े हैं
फ़ुज़ैल जाफ़री
चमकते चाँद से चेहरों के मंज़र से निकल आए
फ़ुज़ैल जाफ़री
उधार
फ़ुर्क़त काकोरवी
तसव्वुर में जमाल-ए-रू-ए-ताबाँ ले के चलता हूँ
फ़ितरत अंसारी
करम के नाम पे उन का इ'ताब चाहते हैं
फ़ितरत अंसारी