Islamic Poetry (page 24)
ज़ालिम है वो ऐसा कि जफ़ा भी नहीं करता
फ़िरदौस गयावी
बड़ा ग़ुरूर है पल भर की नेक-नामी का
फ़िराक़ जलालपुरी
देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
फ़िराक़ गोरखपुरी
जुगनू
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिण्डोला
फ़िराक़ गोरखपुरी
तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है
फ़िराक़ गोरखपुरी
सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात
फ़िराक़ गोरखपुरी
समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है
फ़िराक़ गोरखपुरी
हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
दीदार में इक-तरफ़ा दीदार नज़र आया
फ़िराक़ गोरखपुरी
दौर-ए-आग़ाज़-ए-जफ़ा दिल का सहारा निकला
फ़िराक़ गोरखपुरी
मेरी जबीन-ए-शौक़ ने सज्दे जहाँ किए
फ़िगार उन्नावी
तुम हरीम-ए-नाज़ में बैठे हो बेगाने बने
फ़िगार उन्नावी
तूफ़ाँ से बच के दामन-ए-साहिल में रह गया
फ़िगार उन्नावी
सई-ए-ग़ैर-हासिल को मुद्दआ नहीं मिलता
फ़िगार उन्नावी
किसी अपने से होती है न बेगाने से होती है
फ़िगार उन्नावी
जुरअत-ए-इश्क़ हवस-कार हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
चला हूँ अपनी मंज़िल की तरफ़ तो शादमाँ हो कर
फ़िगार उन्नावी
अस्बाब-ए-ज़िंदगी की हर इक चीज़ है गराँ
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता
फ़ाज़िल जमीली
सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए
फ़ाज़िल जमीली
वो बर्क़ का हो कि मौजों के पेच-ओ-ताब का रंग
फ़ाज़िल अंसारी
न सनम-कदों की है जुस्तुजू न ख़ुदा के घर की तलाश है
फ़ाज़िल अंसारी
चमक सितारों की नज़रों पे बार गुज़री है
फ़ाज़िल अंसारी
तेरी तस्वीर को तस्कीन-ए-जिगर समझे हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
ख़ाक में मुझ को मिरी जान मिला रक्खा है
फ़ज़ल हुसैन साबिर
इधर भी देख ज़रा बे-क़रार हम भी हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
वही रिवायत गज़ीदा-दानिश वही हिकायत किताब वाली
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
कभी याद-ए-ख़ुदा कभी इश्क़-ए-बुताँ यूँही सारी उम्र गँवा बैठा
फ़य्याज़ तहसीन
चोरी ख़ुदा से जब नहीं बंदों से किस लिए
फ़य्याज़ हाशमी