Islamic Poetry (page 22)
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
ग़ालिब
ख़ुदा शरमाए हाथों को कि रखते हैं कशाकश में
ग़ालिब
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
ग़ालिब
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
ग़ालिब
हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही
ग़ालिब
देखिए लाती है उस शोख़ की नख़वत क्या रंग
ग़ालिब
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
ग़ालिब
अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग
ग़ालिब
अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
ग़ालिब
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
ग़ालिब
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
ग़ालिब
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
ग़ालिब
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
ग़ालिब
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है
ग़ालिब
क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को
ग़ालिब
ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
ग़ालिब
नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं
ग़ालिब
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
ग़ालिब
न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
ग़ालिब
मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
ग़ालिब
मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
ग़ालिब
मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की
ग़ालिब
की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं
ग़ालिब
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
ग़ालिब
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए
ग़ालिब
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
ग़ालिब
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
ग़ालिब
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
ग़ालिब