Islamic Poetry (page 25)

मस्तों के जो उसूल हैं उन को निभा के पी

फ़य्याज़ हाशमी

किसी को सोचना दिल का गुदाज़ हो जाना

फ़य्याज़ फ़ारुक़ी

मिल रही है मुझे ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा

फ़े सीन एजाज़

ये दिल माँगे मोर

फ़े सीन एजाज़

उस की हर बात ने जादू सा किया था पहले

फ़े सीन एजाज़

मिरे घर की ईंटें चुरा ले गया वो

फ़े सीन एजाज़

दिया जला के कोई चाँद पर रखा होगा

फ़े सीन एजाज़

अच्छी-ख़ासी रुस्वाई का सबब होती है

फ़े सीन एजाज़

आँख और नींद के रिश्ते मुझे वापस कर दे

फ़े सीन एजाज़

यूँ लगा देख के जैसे कोई अपना आया

फ़ातिमा वसीया जायसी

नहीं ख़याल तो फिर इंतिज़ार किस का है

फ़ातिमा वसीया जायसी

उस की दीवार पे मनक़ूश है वो हर्फ़-ए-वफ़ा

फ़सीह अकमल

मुनव्वर जिस्म-ओ-जाँ होने लगे हैं

फ़सीह अकमल

मुद्दत से वो ख़ुशबू-ए-हिना ही नहीं आई

फ़सीह अकमल

किसी के सामने इस तरह सुर्ख़-रू होगी

फ़सीह अकमल

ग़ुबार-ए-तंग-ज़ेहनी सूरत-ए-ख़ंजर निकलता है

फ़सीह अकमल

इसी फ़ुतूर में कर्ब-ओ-बला से लिपटे हुए

फ़रियाद आज़र

ये दिल-कथा है अदाकार तेरे बस में नहीं

फ़रताश सय्यद

गली का पत्थर था मुझ में आया बिगाड़ ऐसा

फ़रताश सय्यद

तमाम फेंके गए पत्थरों पे भारी था

फ़र्रुख़ जाफ़री

तू ख़ुदा है तो बजा मुझ को डराता क्यूँ है

फ़ारूक़ नाज़की

तेज़ाब, आकार ख़ुश्बू का

फ़ारूक़ नाज़की

नई बासी कोई ख़बर दे दे

फ़ारूक़ नाज़की

न पानियों का इज़्तिरार शहर में

फ़ारूक़ मुज़्तर

अल्लाह के बंदों की है दुनिया ही निराली

फ़ारूक़ बाँसपारी

कोहसार का ख़ूगर है न पाबंद-ए-गुलिस्ताँ

फ़ारूक़ बाँसपारी

ये सौदा इश्क़ का आसान सा हे

फ़ारूक़ बख़्शी

रेज़ा रेज़ा सा भला मुझ में बिखरता क्या हे

फ़ारूक़ बख़्शी

ख़ुदा करे कि ये मिट्टी बिखर भी जाए अब

फ़ारूक़ बख़्शी

दिल नहीं मिलने का फिर मेरा सितमगर टूट कर

फ़रोग़ हैदराबादी