Islamic Poetry (page 27)
रात बहुत शराब पी रात बहुत पढ़ी नमाज़
फ़रहत एहसास
पुराना ज़ख़्म जिसे तजरबा ज़ियादा है
फ़रहत एहसास
ना-क़ाबिल-ए-यक़ीं था अगरचे शुरूअ' में
फ़रहत एहसास
मिला है जिस्म कि उस का गुमाँ मिला है मुझे
फ़रहत एहसास
मेरी मिट्टी का नसब बे-सर-ओ-सामानी से
फ़रहत एहसास
मिरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में
फ़रहत एहसास
मैं अपने रू-ए-हक़ीक़त को खो नहीं सकता
फ़रहत एहसास
लगे हुए हैं ज़माने के इंतिज़ाम में हम
फ़रहत एहसास
क्या बैठ जाएँ आन के नज़दीक आप के
फ़रहत एहसास
ख़ुदा ख़ामोश बंदे बोलते हैं
फ़रहत एहसास
ख़ुद से इंकार को हम-ज़ाद किया है मैं ने
फ़रहत एहसास
ख़लल आया न हक़ीक़त में न अफ़्साना बना
फ़रहत एहसास
कभी ख़ुदा कभी इंसान रोक लेता है
फ़रहत एहसास
जिस्म की कुछ और अभी मिट्टी निकाल
फ़रहत एहसास
जिस तरह पैदा हुए उस से जुदा पैदा करो
फ़रहत एहसास
जिस को जैसा भी है दरकार उसे वैसा मिल जाए
फ़रहत एहसास
झगड़े ख़ुदा से हो गए अहद-ए-शबाब में
फ़रहत एहसास
हम को बरा-ए-दुनिया बे-जान कर दिया है
फ़रहत एहसास
हम अपना इस्म ले कर शहर-ए-सिफ़त से निकले
फ़रहत एहसास
हुई इक ख़्वाब से शादी मिरी तन्हाई की
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
दोनों का ला-शुऊ'र है इतना मिला हुआ
फ़रहत एहसास
दिन ने इतना जो मरीज़ाना बना रक्खा है
फ़रहत एहसास
दिल ने इमदाद कभी हस्ब-ए-ज़रूरत नहीं दी
फ़रहत एहसास
दबा पड़ा है कहीं दश्त में ख़ज़ाना मिरा
फ़रहत एहसास
बहुत ज़मीन बहुत आसमाँ मिलेंगे तुम्हें
फ़रहत एहसास
असीर-ए-ख़ाक भी हूँ ख़ाक से रिहा भी हूँ मैं
फ़रहत एहसास
गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया
फ़रहत अब्बास शाह
उदास शाम में पज़मुर्दा बाद बन के न आ
फ़रहान सालिम