Islamic Poetry (page 16)
ख़ुदा को न तकलीफ़ दे डूबने में
हफ़ीज़ जालंधरी
जिस ने इस दौर के इंसान किए हैं पैदा
हफ़ीज़ जालंधरी
हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब
हफ़ीज़ जालंधरी
हाँ कैफ़-ए-बे-ख़ुदी की वो साअत भी याद है
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल को ख़ुदा की याद तले भी दबा चुका
हफ़ीज़ जालंधरी
बुत-कदे से चले हो काबे को
हफ़ीज़ जालंधरी
आने वाले किसी तूफ़ान का रोना रो कर
हफ़ीज़ जालंधरी
तकिया
हफ़ीज़ जालंधरी
पिए जा
हफ़ीज़ जालंधरी
कृष्ण कन्हैया
हफ़ीज़ जालंधरी
'इक़बाल' के मज़ार पर
हफ़ीज़ जालंधरी
ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है
हफ़ीज़ जालंधरी
वो सरख़ुशी दे कि ज़िंदगी को शबाब से बहर-याब कर दे
हफ़ीज़ जालंधरी
उभरे जो ख़ाक से वो तह-ए-ख़ाक हो गए
हफ़ीज़ जालंधरी
तीर चिल्ले पे न आना कि ख़ता हो जाना
हफ़ीज़ जालंधरी
तिरे दिल में भी हैं कुदूरतें तिरे लब पे भी हैं शिकायतें
हफ़ीज़ जालंधरी
रंग बदला यार ने वो प्यार की बातें गईं
हफ़ीज़ जालंधरी
फिर लुत्फ़-ए-ख़लिश देने लगी याद किसी की
हफ़ीज़ जालंधरी
ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
निगाह-ए-आरज़ू-आमोज़ का चर्चा न हो जाए
हफ़ीज़ जालंधरी
न कर दिल-जूई ऐ सय्याद मेरी
हफ़ीज़ जालंधरी
मुझे शाद रखना कि नाशाद रखना
हफ़ीज़ जालंधरी
मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
मस्तों पे उँगलियाँ न उठाओ बहार में
हफ़ीज़ जालंधरी
मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी
क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई चारा नहीं दुआ के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
किसी के रू-ब-रू बैठा रहा मैं बे-ज़बाँ हो कर
हफ़ीज़ जालंधरी
कम-बख़्त दिल बुरा हुआ तिरी आह आह का
हफ़ीज़ जालंधरी