Love Poetry (page 131)
सहरा के संगीन सफ़र में आब-रसानी कम न पड़े
फ़रहत एहसास
साहिब-ए-इश्क़ अब इतनी सी तो राहत मुझे दे
फ़रहत एहसास
सब ने'मतें हैं शहर में इंसान ही नहीं
फ़रहत एहसास
सब लज़्ज़तें विसाल की बेकार करते हो
फ़रहत एहसास
रूह को तो इक ज़रा सी रौशनी दरकार है
फ़रहत एहसास
रौनक़-ए-ज़हर हो चुका मिरा दिल
फ़रहत एहसास
रास्ता दे ऐ हुजूम-ए-शहर घर जाएँगे हम
फ़रहत एहसास
रात बहुत शराब पी रात बहुत पढ़ी नमाज़
फ़रहत एहसास
पुराना ज़ख़्म जिसे तजरबा ज़ियादा है
फ़रहत एहसास
फिर वही मौसम-ए-जुदाई है
फ़रहत एहसास
पैकर-ए-अक़्ल तिरे होश ठिकाने लग जाएँ
फ़रहत एहसास
पहले तो ज़रा सा हट के देखा
फ़रहत एहसास
नंग धड़ंग मलंग तरंग में आएगा जो वही काम करेंगे
फ़रहत एहसास
नहीं देखता दिन जिसे चश्म-ए-शब देखती है
फ़रहत एहसास
मुसलसल अश्क-बारी हो रही है
फ़रहत एहसास
मोहब्बत का सिला-कार-ए-मोहब्बत से नहीं मिलता
फ़रहत एहसास
मोहब्बत चाहते हो क्यूँ वफ़ा क्यूँ माँगते हो
फ़रहत एहसास
मिला है जिस्म कि उस का गुमाँ मिला है मुझे
फ़रहत एहसास
मिरी मोहब्बत में सारी दुनिया को इक खिलौना बना दिया है
फ़रहत एहसास
मेरी मिट्टी का नसब बे-सर-ओ-सामानी से
फ़रहत एहसास
मिरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में
फ़रहत एहसास
मिरे शे'रों में फ़नकारी नहीं है
फ़रहत एहसास
मैं तमाम गर्द-ओ-ग़ुबार हूँ मुझे मेरी सूरत-ए-हाल दे
फ़रहत एहसास
मैं शहरी हूँ मगर मेरी बयाबानी नहीं जाती
फ़रहत एहसास
मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
फ़रहत एहसास
मैं अपने रू-ए-हक़ीक़त को खो नहीं सकता
फ़रहत एहसास
महफ़िल में अब के आओ तो ऐसी ख़ता न हो
फ़रहत एहसास
लोग यूँ जाते नज़र आते हैं मक़्तल की तरफ़
फ़रहत एहसास
लगे हुए हैं ज़माने के इंतिज़ाम में हम
फ़रहत एहसास
कुर्सी-ए-दिल पे तिरे जाते ही दर्द आ बैठे
फ़रहत एहसास