Love Poetry (page 133)
हम अपना इस्म ले कर शहर-ए-सिफ़त से निकले
फ़रहत एहसास
हुई इक ख़्वाब से शादी मिरी तन्हाई की
फ़रहत एहसास
हर इक जानिब उन आँखों का इशारा जा रहा है
फ़रहत एहसास
हमेशा का ये मंज़र है कि सहरा जल रहा है
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
है शोर साहिलों पर सैलाब आ रहा है
फ़रहत एहसास
घर में चीज़ें बढ़ रही हैं ज़िंदगी कम हो रही है
फ़रहत एहसास
घर बनाने में तमाम अहल-ए-सफ़र लग गए हैं
फ़रहत एहसास
गर अपने आप में इंसान बढ़ता जा रहा है
फ़रहत एहसास
इक हवा सा मिरे सीने से मिरा यार गया
फ़रहत एहसास
इक हवा आई है दीवार में दर करने को
फ़रहत एहसास
एक ग़ज़ल कहते हैं इक कैफ़िय्यत तारी कर लेते हैं
फ़रहत एहसास
दिन ने इतना जो मरीज़ाना बना रक्खा है
फ़रहत एहसास
दिल ने इमदाद कभी हस्ब-ए-ज़रूरत नहीं दी
फ़रहत एहसास
देखते ही देखते खोने से पहले देखते
फ़रहत एहसास
दबा पड़ा है कहीं दश्त में ख़ज़ाना मिरा
फ़रहत एहसास
चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना
फ़रहत एहसास
चाकरी में रह के इस दुनिया की मोहमल हो गए थे
फ़रहत एहसास
बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला
फ़रहत एहसास
बीमार हो गया हूँ शिफा-ख़ाना चाहिए
फ़रहत एहसास
बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी
फ़रहत एहसास
बहुत सी आँखें लगीं हैं और एक ख़्वाब तय्यार हो रहा है
फ़रहत एहसास
बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है
फ़रहत एहसास
बादल इस बार जो उस शहर पे छाए हुए हैं
फ़रहत एहसास
औरों ने उस गली से क्या क्या न कुछ ख़रीदा
फ़रहत एहसास
औरों का सारा काम मुझे दे दिया गया
फ़रहत एहसास
अजीब तजरबा आँखों को होने वाला था
फ़रहत एहसास
अहल-ए-बदन को इश्क़ है बाहर की कोई चीज़
फ़रहत एहसास
अभी नहीं कि अभी महज़ इस्तिआरा बना
फ़रहत एहसास