Love Poetry (page 132)
कुछ भी न कहना कुछ भी न सुनना लफ़्ज़ में लफ़्ज़ उतरने देना
फ़रहत एहसास
कुछ बताता नहीं क्या सानेहा कर बैठा है
फ़रहत एहसास
किस सलीक़े से वो मुझ में रात-भर रह कर गया
फ़रहत एहसास
ख़ुदा ख़ामोश बंदे बोलते हैं
फ़रहत एहसास
ख़ुद से इंकार को हम-ज़ाद किया है मैं ने
फ़रहत एहसास
ख़ूब होनी है अब इस शहर में रुस्वाई मिरी
फ़रहत एहसास
ख़िलाफ़-ए-गर्दिश-ए-मा'मूल होना चाहता हूँ
फ़रहत एहसास
ख़त बहुत उस के पढ़े हैं कभी देखा नहीं है
फ़रहत एहसास
ख़ाना-साज़ उजाला मार
फ़रहत एहसास
ख़लल आया न हक़ीक़त में न अफ़्साना बना
फ़रहत एहसास
ख़ाक ओ ख़ूँ की नई तंज़ीम में शामिल हो जाओ
फ़रहत एहसास
कभी हँसते नहीं कभी रोते नहीं कभी कोई गुनाह नहीं करते
फ़रहत एहसास
काबा-ए-दिल दिमाग़ का फिर से ग़ुलाम हो गया
फ़रहत एहसास
काम उन आँखों की हवसनाकी की साज़िश आ गई
फ़रहत एहसास
जो इश्क़ चाहता है वो होना नहीं है आज
फ़रहत एहसास
जिस्म की क़ैद से सब रंग तुम्हारे निकल आए
फ़रहत एहसास
जिस्म की कुछ और अभी मिट्टी निकाल
फ़रहत एहसास
जिस्म के पार वो दिया सा है
फ़रहत एहसास
जिस्म जब महव-ए-सुख़न हों शब-ए-ख़ामोशी से
फ़रहत एहसास
जिस को जैसा भी है दरकार उसे वैसा मिल जाए
फ़रहत एहसास
झगड़े ख़ुदा से हो गए अहद-ए-शबाब में
फ़रहत एहसास
जब उस को देखते रहने से थकने लगता हूँ
फ़रहत एहसास
इश्क़ में कितने बुलंद इम्कान हो जाते हैं हम
फ़रहत एहसास
इश्क़ भी करना है हम को और ज़िंदा भी रहना है
फ़रहत एहसास
इस तरह आता हूँ बाज़ारों के बीच
फ़रहत एहसास
ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला
फ़रहत एहसास
हम ने परिंद-ए-वस्ल के पर काट डाले हैं
फ़रहत एहसास
हम न प्यासे हैं न पानी के लिए आए हैं
फ़रहत एहसास
हम को बरा-ए-दुनिया बे-जान कर दिया है
फ़रहत एहसास
हम अपने आप को अपने से कम भी करते रहते हैं
फ़रहत एहसास