Love Poetry (page 134)
आया ज़रा सी देर रहा ग़ुल गया बदन
फ़रहत एहसास
आख़िर उस के हुस्न की मुश्किल को हल मैं ने किया
फ़रहत एहसास
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
फ़रहत अब्बास शाह
मौत का वक़्त गुज़र जाएगा
फ़रहत अब्बास शाह
कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
फ़रहत अब्बास शाह
गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया
फ़रहत अब्बास शाह
ज़िक्र-ए-शब के सईद हो गए क्या
फ़रहत अब्बास
शहर-दर-शहर दीदा-वर भटके
फ़रहत अब्बास
ख़याल आतिशीं ख़्वाबीदा सूरतें दी हैं
फ़रहत अब्बास
जल्वा है वो कि ताब-ए-नज़र तक नहीं रही
फ़रहत अब्बास
जब तिरी ज़ात को फैला हुआ दरिया समझूँ
फ़रहत अब्बास
हम से मिल कर कोई गुफ़्तुगू कीजिए
फ़रहत अब्बास
यूँ भी किया है हम ने हक़-ए-दिलबरी अदा
फ़रहान सालिम
उन्हें गुमाँ कि मुझे उन से रब्त है 'सालिम'
फ़रहान सालिम
हैं इन में बंद किसी अहद-ए-रस्त-ख़ेज़ के अक्स
फ़रहान सालिम
है मेरी आँखों में अक्स-ए-नविश्ता-ए-दीवार
फ़रहान सालिम
अक्स कुछ न बदलेगा आइनों को धोने से
फ़रहान सालिम
आम है इज़्न कि जो चाहो हवा पर लिख दो
फ़रहान सालिम
ये क्या हुआ कि सभी अब तो दाग़ जलने लगे
फ़रहान सालिम
वो क़ाफ़िला जो रह-ए-शाएरी में कम उतरा
फ़रहान सालिम
उदास शाम में पज़मुर्दा बाद बन के न आ
फ़रहान सालिम
तू मिरी इब्तिदा तू मिरी इंतिहा मैं समुंदर हूँ तू साहिलों की हवा
फ़रहान सालिम
शुहूद-ए-दिल-ज़दगाँ मंज़रों में रख आना
फ़रहान सालिम
शिकस्त-ए-आसमाँ हो जाऊँगा मैं
फ़रहान सालिम
शौक़ आसूदा-ए-तहलील-ए-मुअम्मा न हुआ
फ़रहान सालिम
मिरे चराग़ो मिरा गंज-ए-बे-कराँ ले लो
फ़रहान सालिम
मता-ए-दर्द मआल-ए-हयात है शायद
फ़रहान सालिम
मक्र-ए-हयात रुख़ की क़बा भी उतार दी
फ़रहान सालिम
मैं तिरे संग कैसे चलूँ हम-सफ़र तू समुंदर है मैं साहिलों की हवा
फ़रहान सालिम
क्या बताएँ क्या कल शब आख़िरी पहर देखा
फ़रहान सालिम