Love Poetry (page 152)
इश्क़ की आज इंतिहा कर दो
फ़ैसल फेहमी
जिसे कल रात भर पूजा गया था
फ़ैसल अज़ीम
शामियानों की वज़ाहत तो नहीं की गई है
फ़ैसल अजमी
मैं ज़ख़्म खा के गिरा था कि थाम उस ने लिया
फ़ैसल अजमी
हिज्र मौजूद है फ़साने में
फ़ैसल अजमी
हर्फ़ अपने ही मआनी की तरह होता है
फ़ैसल अजमी
हर शख़्स परेशान है घबराया हुआ है
फ़ैसल अजमी
गिर जाए जो दीवार तो मातम नहीं करते
फ़ैसल अजमी
अदावतों में जो ख़ल्क़-ए-ख़ुदा लगी हुई है
फ़ैसल अजमी
ज़बानों का बोसा
फ़हमीदा रियाज़
तिफ़्लाँ की तो कुछ तक़्सीर न थी
फ़हमीदा रियाज़
सोच
फ़हमीदा रियाज़
पूर्वांचल
फ़हमीदा रियाज़
पत्थर की ज़बान
फ़हमीदा रियाज़
नज़्र-ए-फ़िराक़
फ़हमीदा रियाज़
मेघ दूत
फ़हमीदा रियाज़
कब तक
फ़हमीदा रियाज़
इंक़िलाबी औरत
फ़हमीदा रियाज़
एक ज़न-ए-ख़ाना-ब-दोश
फ़हमीदा रियाज़
एक रात की कहानी
फ़हमीदा रियाज़
दिल्ली तिरी छाँव…
फ़हमीदा रियाज़
चादर और चार-दीवारी
फ़हमीदा रियाज़
बैठा है मेरे सामने वो
फ़हमीदा रियाज़
अबद
फ़हमीदा रियाज़
अब सो जाओ
फ़हमीदा रियाज़
आलम-ए-बर्ज़ख़
फ़हमीदा रियाज़
चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ
फ़हमीदा रियाज़
परेशाँ है वो झूटा इश्क़ कर के
फ़हमी बदायूनी
ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी
फ़हमी बदायूनी
ज़रा मोहतात होना चाहिए था
फ़हमी बदायूनी