Love Poetry (page 154)
ऐ मुबारज़-तलब
फ़हीम शनास काज़मी
अब तो कुछ भी याद नहीं
फ़हीम शनास काज़मी
आईना देखते हो
फ़हीम शनास काज़मी
उस ने पूछा भी मगर हाल छुपाए गए हम
फ़हीम शनास काज़मी
तुम्हारे ब'अद जो बिखरे तो कू-ब-कू हुए हम
फ़हीम शनास काज़मी
रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका
फ़हीम शनास काज़मी
मैं यूँ जहाँ के ख़्वाब से तन्हा गुज़र गया
फ़हीम शनास काज़मी
लहू की लहर में इक ख़्वाब-ए-दिल-शिकन भी गया
फ़हीम शनास काज़मी
हुस्न अल्फ़ाज़ के पैकर में अगर आ सकता
फ़हीम शनास काज़मी
हम एक दिन निकल आए थे ख़्वाब से बाहर
फ़हीम शनास काज़मी
धुँद में डूबी सारी फ़ज़ा थी उस के बाल भी गीले थे
फ़हीम शनास काज़मी
बर्ग-ए-सदा को लब से उड़े देर हो गई
फ़हीम शनास काज़मी
बदन को ख़ाक किया और लहू को आब किया
फ़हीम शनास काज़मी
तुम्हारी याद से ये रात कितनी रौशन है
फ़हीम जोगापुरी
मिलन के ब'अद आती है जुदाई
फ़हीम जोगापुरी
दोस्ती में न दुश्मनी में हम
फ़हीम जोगापुरी
लफ़्ज़ का बस है तअ'ल्लुक़ मेरे तेरे दरमियाँ
फ़हीम आज़मी
ख़ाक सेती सजन उठा के किया
फ़ाएज़ देहलवी
हुस्न बे-साख़्ता भाता है मुझे
फ़ाएज़ देहलवी
गुड़ से मीठा है बोसा तुझ लब का
फ़ाएज़ देहलवी
गड़ सीं मीठा है बोसा तुझ लब का
फ़ाएज़ देहलवी
यार मेरा मियान-ए-गुलशन है
फ़ाएज़ देहलवी
तुझ बिना दिल को बे-क़रारी है
फ़ाएज़ देहलवी
तुझ बदन पर जो लाल सारी है
फ़ाएज़ देहलवी
सजन मुझ पर बहुत ना-मेहरबाँ है
फ़ाएज़ देहलवी
मुस्तमिन्दाँ को सताया न करो
फ़ाएज़ देहलवी
मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया
फ़ाएज़ देहलवी
ख़ूबाँ के बीच जानाँ मुम्ताज़ है सरापा
फ़ाएज़ देहलवी
जागीर अगर बहुत न मिली हम कूँ ग़म नहीं
फ़ाएज़ देहलवी
जान-ए-अय्याम-ए-दिलबरी है याद
फ़ाएज़ देहलवी