Love Poetry (page 275)

हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए

अंजुम रूमानी

हम से बात में पेच न डाल

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात, कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

अंजुम रहबर

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए

अंजुम रहबर

रंग इस मौसम में भरना चाहिए

अंजुम रहबर

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

अंजुम रहबर

जिन के आँगन में अमीरी का शजर लगता है

अंजुम रहबर

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अंजुम रहबर

ज़िंदगी अपनी क़रीने से बसर होती नहीं

अंजुम नियाज़ी

मिरी आवाज़ सुन कर ज़िंदगी बेदार हो जैसे

अंजुम नियाज़ी

बे-हिफ़ाज़त ही मिरा गंज-ए-मआ'नी रह गया

अंजुम नियाज़ी

वाइ'ज़ की कड़वी बातों को कब ध्यान में अपने लाते हैं

अंजुम मानपुरी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

वो जब अपने लब खोलें

अंजुम लुधियानवी

वस्ल की रात वो तन्हा होगा

अंजुम लुधियानवी

तोड़ कड़ियाँ ज़मीर कि 'अंजुम'

अंजुम लुधियानवी

प्यार में ताना-बाना चलता रहता है

अंजुम लुधियानवी

काँटों में जो फूल खिला है

अंजुम लुधियानवी

हम सा दीवाना कहाँ मिल पाएगा इस दहर में

अंजुम लुधियानवी

हज़ारों साल चलने कि सज़ा है

अंजुम लुधियानवी

इक झलक तेरी जो पाई होगी

अंजुम लुधियानवी

मिरे मज़ार पे आ कर दिए जलाएगा

अंजुम ख़याली

मिरे मज़ार पे आ कर दिए जलाएगा

अंजुम ख़याली

हँसी में टाल तो देता हूँ अक्सर

अंजुम ख़याली

यही तुम पर भी खुलना है

अंजुम ख़लीक़

तुम्हारी पोरों का लम्स अब तक.....

अंजुम ख़लीक़

ख़ुश-आमदीद

अंजुम ख़लीक़

चाँद हम दोनों से मुशाबह है

अंजुम ख़लीक़