Love Poetry (page 297)

मिरी क़ुर्बतों की ख़ातिर यूँही बे-क़रार होता

आलोक यादव

खुला है ज़ीस्त का इक ख़ुशनुमा वरक़ फिर से

आलोक यादव

जो भी सूखे गुल किताबों में मिले अच्छे लगे

आलोक यादव

गुलों की गर इनायत हो गई तो

आलोक यादव

इक ज़रा सी चाह में जिस रोज़ बिक जाता हूँ मैं

आलोक यादव

भटका करूँगा कब तक राहों में तेरी आ कर

आलोक यादव

बाज़ ख़त पुर-असर भी होते हैं

आलोक यादव

सब सितारे दिलासा देते हैं

आलोक मिश्रा

क्या क़यामत है कि तेरी ही तरह से मुझ से

आलोक मिश्रा

बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा

आलोक मिश्रा

उन की आमद है गुल-फ़िशानी है

आलोक मिश्रा

सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी

आलोक मिश्रा

साल ये कौन सा नया है मुझे

आलोक मिश्रा

फूल से ज़ख़्मों का अम्बार सँभाले हुए हैं

आलोक मिश्रा

मेरे ही आस-पास हो तुम भी

आलोक मिश्रा

जज़्ब कुछ तितलियों के पर में है

आलोक मिश्रा

जाने किस बात से दुखा है बहुत

आलोक मिश्रा

हम मुसलसल इक बयाँ देते हुए

आलोक मिश्रा

धूप अब सर पे आ गई होगी

आलोक मिश्रा

बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा

आलोक मिश्रा

बुझे लबों पे तबस्सुम के गुल सजाता हुआ

आलोक मिश्रा

ये कौन तुम से अब कहे

अलमास शबी

देर-सवेर तो हो जाती है

अलमास शबी

उस जबीं पर जो बल पड़े शायद

अलमास शबी

तेरे पहलू में जी रही थी कभी

अलमास शबी

सवाल कैसे करूँ मैं इस से जवाब है जो मिरी दुआ का

अलमास शबी

जब वो मुझ से कलाम करता है

अलमास शबी

जाने किस मोड़ पर मैं ने देखा नहीं

अलमास शबी

ग़म हँसी में छुपा दिया होगा

अलमास शबी

ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ

अल्लामा इक़बाल