Love Poetry (page 347)

बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा

अहमद मुश्ताक़

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़

अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

कह डाले ग़ज़लों नज़्मों में अफ़्साने क्या क्या

अहमद मासूम

हम से पहले तो कहीं प्यार न था शहर-ब-शहर

अहमद मासूम

दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार

अहमद मासूम

उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है

अहमद महफ़ूज़

सर-ब-सर पैकर-ए-इज़हार में लाता है मुझे

अहमद महफ़ूज़

रक़्स-ए-शरर क्या अब के वहशत-नाक हुआ

अहमद महफ़ूज़

फेंकते संग-ए-सदा दरिया-ए-वीरानी में हम

अहमद महफ़ूज़

मैं बंद आँखों से कब तलक ये ग़ुबार देखूँ

अहमद महफ़ूज़

लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था

अहमद महफ़ूज़

अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना

अहमद महफ़ूज़

तुम्हारे नाम पे मैं जल-बुझा तो इल्म हुआ

अहमद लतीफ़

मैं खो गया हूँ कहाँ आशियाँ बनाते हुए

अहमद लतीफ़

ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी

अहमद ख़याल

महकते फूल सितारे दमकता चाँद धनक

अहमद ख़याल

ऐन मुमकिन है कि बीनाई मुझे धोका दे

अहमद ख़याल

ज़िंदगी ख़ौफ़ से तश्कील नहीं करनी मुझे

अहमद ख़याल

ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था

अहमद ख़याल

उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका

अहमद ख़याल

उन को में कर्बला के महीने में लाऊँगा

अहमद ख़याल

क़यामत से क़यामत से गुज़ारे जा रहे थे

अहमद ख़याल

जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया

अहमद ख़याल

जिस समय तेरा असर था मुझ में

अहमद ख़याल

ग़ुबार-ए-अब्र बन गया कमाल कर दिया गया

अहमद ख़याल