Love Poetry (page 348)
ग़ुबार अब्र बन गया कमाल कर दिया गया
अहमद ख़याल
फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं
अहमद ख़याल
दस्त-बस्तों को इशारा भी तो हो सकता है
अहमद ख़याल
दश्त ओ जुनूँ का सिलसिला मेरे लहू में आ गया
अहमद ख़याल
दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया
अहमद ख़याल
दरिया में दश्त दश्त में दरिया सराब है
अहमद ख़याल
ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक
अहमद ख़याल
तू ने ऐ इश्क़ ये सोचा कि तिरा क्या होगा
अहमद कामरान
रास आएगी मोहब्बत उस को
अहमद कामरान
कुर्रा-ए-हिज्र से होना है नुमूदार मुझे
अहमद कामरान
चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त
अहमद कामरान
ये जो बेदार दिखाई दिया हूँ
अहमद कामरान
तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं
अहमद कामरान
तेरे हिस्से के भी सदमात उठा लेता हूँ
अहमद कामरान
मिट्टी से बग़ावत न बग़ावत से गुरेज़ाँ
अहमद कामरान
कोई मंसब कोई दस्तार नहीं चाहिए है
अहमद कामरान
ख़्वाब यूँ ही नहीं होते पूरे
अहमद कामरान
दाना-ए-गंदुम-ए-बेदार उठाने लगा हूँ
अहमद कामरान
चराग़ ताक़-ए-तिलिस्मात में दिखाई दिया
अहमद कामरान
वो अपने हुस्न की ख़ैरात देने वाले हैं
अहमद कमाल परवाज़ी
तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
अहमद कमाल परवाज़ी
जो खो गया है कहीं ज़िंदगी के मेले में
अहमद कमाल परवाज़ी
ज़रा ज़रा सी कई कश्तियाँ बना लेना
अहमद कमाल परवाज़ी
ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है
अहमद कमाल परवाज़ी
वो अब तिजारती पहलू निकाल लेता है
अहमद कमाल परवाज़ी
तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
तमाम भीड़ से आगे निकल के देखते हैं
अहमद कमाल परवाज़ी
शाम के ब'अद सितारों को सँभलने न दिया
अहमद कमाल परवाज़ी