Love Poetry (page 370)
शम्स मादूम है तारों में ज़िया है तो सही
अफ़रोज़ आलम
शबनम की तरह सुब्ह की आँखों में पड़ा है
अफ़रोज़ आलम
फैले हुए ग़ुबार का फिर मो'जिज़ा भी देख
अफ़रोज़ आलम
मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा
अफ़रोज़ आलम
जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जब अपना साया ही दुश्मन है क्या किया जाए
अफ़रोज़ आलम
हिसार-ए-दीद में रोईदगी मालूम होती है
अफ़रोज़ आलम
गुज़रे लम्हात का एहसास हुआ जाता है
अफ़रोज़ आलम
बड़ा ख़ुशनुमा ये मक़ाम है नई ज़िंदगी की तलाश कर
अफ़रोज़ आलम
ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है
अफ़रोज़ आलम
शौक़-ए-वारफ़्ता चला शहर-ए-तमाशा की तरफ़
अफ़ीफ़ सिराज
शब ढली मेरी और सहर न हुई
अफ़ीफ़ सिराज
मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस
अफ़ीफ़ सिराज
जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है
अादिल रशीद
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
आदिल मंसूरी
फिर बालों में रात हुई
आदिल मंसूरी
हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
आदिल मंसूरी
वो मर गई थी
आदिल मंसूरी
वालिद के इंतिक़ाल पर
आदिल मंसूरी
टूटी लज़्ज़त की ख़ुशबू
आदिल मंसूरी
तंग तारीक गली में कुत्ता
आदिल मंसूरी
सियाह सायों की तिश्नगी में
आदिल मंसूरी
सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ
आदिल मंसूरी
सितारा सो गया है
आदिल मंसूरी
सातवीं पिसली में पीली चाँदनी
आदिल मंसूरी
साए की पिसली से निकला है जिस्म तिरा
आदिल मंसूरी
रात और दिन के दरमियाँ कोई
आदिल मंसूरी
लहू को सुर्ख़ गुलाबों में बंद रहने दो
आदिल मंसूरी