Love Poetry (page 371)
लफ़्ज़ की छाँव में
आदिल मंसूरी
कीचड़ में अटा मौसम
आदिल मंसूरी
खिड़की अंधी हो चुकी है
आदिल मंसूरी
हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद
आदिल मंसूरी
गोश्त की सड़कों पर
आदिल मंसूरी
गोल कमरे को सजाता हूँ
आदिल मंसूरी
फ़ैज़
आदिल मंसूरी
एक नज़्म
आदिल मंसूरी
दर्द तंहाई की पस्ली से निकल कर आया
आदिल मंसूरी
चाँद के पेट में हमल मछली
आदिल मंसूरी
आमीन
आदिल मंसूरी
ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
आदिल मंसूरी
वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ
आदिल मंसूरी
वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर
आदिल मंसूरी
साँस की आँच ज़रा तेज़ करो
आदिल मंसूरी
सड़कों पर सूरज उतरा
आदिल मंसूरी
पानी को पत्थर कहते हैं
आदिल मंसूरी
पहलू के आर-पार गुज़रता हुआ सा हो
आदिल मंसूरी
कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ
आदिल मंसूरी
जो चीज़ थी कमरे में वो बे-रब्त पड़ी थी
आदिल मंसूरी
जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
आदिल मंसूरी
जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा
आदिल मंसूरी
हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा
आदिल मंसूरी
घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
आदिल मंसूरी
गाँठी है उस ने दोस्ती इक पेश-इमाम से
आदिल मंसूरी
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
आदिल मंसूरी
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
आदिल मंसूरी
चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को
आदिल मंसूरी
बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
आदिल मंसूरी
भूल कर भी न फिर मलेगा तू
आदिल मंसूरी