Love Poetry (page 393)
तब-ए-हस्सास मिरी ख़ार हुई जाती है
अब्दुल अहद साज़
सवाल का जवाब था जवाब के सवाल में
अब्दुल अहद साज़
सवाल बे-अमान बन के रह गए
अब्दुल अहद साज़
सामेआ लज़्ज़त-ए-बयान-ज़दा
अब्दुल अहद साज़
सबक़ उम्र का या ज़माने का है
अब्दुल अहद साज़
नज़र आसूदा-काम-ए-रौशनी है
अब्दुल अहद साज़
मिज़ाज-ए-सहल-तलब अपना रुख़्सतें माँगे
अब्दुल अहद साज़
मिरी निगाहों पे जिस ने शाम ओ सहर की रानाइयाँ लिखी हैं
अब्दुल अहद साज़
मिरी झोली में वो लफ़्ज़ों के मोती डाल देता है
अब्दुल अहद साज़
मेरी आँखों से गुज़र कर दिल ओ जाँ में आना
अब्दुल अहद साज़
मौत से आगे सोच के आना फिर जी लेना
अब्दुल अहद साज़
मरने की पुख़्ता-ख़याली में जीने की ख़ामी रहने दो
अब्दुल अहद साज़
मैं ने अपनी रूह को अपने तन से अलग कर रक्खा है
अब्दुल अहद साज़
लम्हा-ए-तख़्लीक़ बख़्शा उस ने मुझ को भीक में
अब्दुल अहद साज़
खुली जब आँख तो देखा कि दुनिया सर पे रक्खी है
अब्दुल अहद साज़
ख़राब-ए-दर्द हुए ग़म-परस्तियों में रहे
अब्दुल अहद साज़
कभी नुमायाँ कभी तह-नशीं भी रहते हैं
अब्दुल अहद साज़
जो कुछ भी ये जहाँ की ज़माने की घर की है
अब्दुल अहद साज़
जैसे कोई दायरा तकमील पर है
अब्दुल अहद साज़
जब तक शब्द के दीप जलेंगे सब आएँगे तब तक यार
अब्दुल अहद साज़
हिसार-ए-दीद में जागा तिलिस्म-ए-बीनाई
अब्दुल अहद साज़
हसरत-ए-दीद नहीं ज़ौक़-ए-तमाशा भी नहीं
अब्दुल अहद साज़
हर इक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है
अब्दुल अहद साज़
घुल सी गई रूह में उदासी
अब्दुल अहद साज़
इक ईमा इक इशारा मर रहा है
अब्दुल अहद साज़
दिखाई देने के और दिखाई न देने के दरमियान सा कुछ
अब्दुल अहद साज़
दरख़्त रूह के झूमे परिंद गाने लगे
अब्दुल अहद साज़
बंद फ़सीलें शहर की तोड़ें ज़ात की गिरहें खोलें
अब्दुल अहद साज़
बजा कि पाबंद-ए-कूचा-ए-नाज़ हम हुए थे
अब्दुल अहद साज़
बजा कि लुत्फ़ है दुनिया में शोर करने का
अब्दुल अहद साज़