Love Poetry (page 396)
मकाँ-भर हम को वीरानी बहुत है
अब्बास ताबिश
मैं अपने इश्क़ को ख़ुश-एहतिमाम करता हुआ
अब्बास ताबिश
मह-रुख़ जो घरों से कभी बाहर निकल आए
अब्बास ताबिश
कुंज-ए-ग़ज़ल न क़ैस का वीराना चाहिए
अब्बास ताबिश
कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है
अब्बास ताबिश
कोई मिलता नहीं ये बोझ उठाने के लिए
अब्बास ताबिश
खा के सूखी रोटियाँ पानी के साथ
अब्बास ताबिश
जो भी मिन-जुम्ला-ए-अश्जार नहीं हो सकता
अब्बास ताबिश
झिलमिल से क्या रब्त निकालें कश्ती की तक़दीरों का
अब्बास ताबिश
जहान-ए-मर्ग-ए-सदा में इक और सिलसिला ख़त्म हो गया है
अब्बास ताबिश
इतना आसाँ नहीं मसनद पे बिठाया गया मैं
अब्बास ताबिश
इश्क़ की जोत जगाने में बड़ी देर लगी
अब्बास ताबिश
हम ने चुप रह के जो एक साथ बिताया हुआ है
अब्बास ताबिश
हवा-ए-तेज़ तिरा एक काम आख़िरी है
अब्बास ताबिश
हवा-ए-मौसम-ए-गुल से लहू लहू तुम थे
अब्बास ताबिश
हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
अब्बास ताबिश
फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
अब्बास ताबिश
एक क़दम तेग़ पे और एक शरर पर रक्खा
अब्बास ताबिश
डूब कर भी न पड़ा फ़र्क़ गिराँ-जानी में
अब्बास ताबिश
दिल दुखों के हिसार में आया
अब्बास ताबिश
दी है वहशत तो ये वहशत ही मुसलसल हो जाए
अब्बास ताबिश
दश्त-ए-हैरत में सबील-ए-तिश्नगी बन जाइए
अब्बास ताबिश
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं
अब्बास ताबिश
दम-ए-सुख़न ही तबीअ'त लहू लहू की जाए
अब्बास ताबिश
दहन खोलेंगी अपनी सीपियाँ आहिस्ता आहिस्ता
अब्बास ताबिश
चश्म-ए-नम-दीदा सही ख़ित्ता-ए-शादाब मिरा
अब्बास ताबिश
चराग़-ए-सुब्ह जला कोई ना-शनासी में
अब्बास ताबिश
चाँद को तालाब मुझ को ख़्वाब वापस कर दिया
अब्बास ताबिश
चाँद का पत्थर बाँध के तन से उतरी मंज़र-ए-ख़्वाब में चुप
अब्बास ताबिश
बयाँ अपनी हक़ीक़त कर रहा हूँ
अब्बास ताबिश