Love Poetry (page 397)

बैठता उठता था मैं यारों के बीच

अब्बास ताबिश

बहुत बे-कार मौसम है मगर कुछ काम करना है

अब्बास ताबिश

बदन के चाक पर ज़र्फ़-ए-नुमू तय्यार करता हूँ

अब्बास ताबिश

बचपन का दौर अहद-ए-जवानी में खो गया

अब्बास ताबिश

अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी

अब्बास ताबिश

अजब सौदा-ए-वहशत है दिल-ए-ख़ुद-सर में रहता है

अब्बास ताबिश

ऐसे तो कोई तर्क सुकूनत नहीं करता

अब्बास ताबिश

अब परिंदों की यहाँ नक़्ल-ए-मकानी कम है

अब्बास ताबिश

अब मोहब्बत न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है

अब्बास ताबिश

अब अधूरे इश्क़ की तकमील ही मुमकिन नहीं

अब्बास ताबिश

आँख पे पट्टी बाँध के मुझ को तन्हा छोड़ दिया है

अब्बास ताबिश

बहुत अज़ीज़ थी ये ज़िंदगी मगर हम लोग

अब्बास रिज़वी

ताबीर को तरसे हुए ख़्वाबों की ज़बाँ हैं

अब्बास रिज़वी

सितारे चाहते हैं माहताब माँगते हैं

अब्बास रिज़वी

मैं उस से दूर रहा उस की दस्तरस में रहा

अब्बास रिज़वी

जिस को हम समझते थे उम्र भर का रिश्ता है

अब्बास रिज़वी

हम तिरे हुस्न-ए-जहाँ-ताब से डर जाते हैं

अब्बास रिज़वी

गुज़र गया वो ज़माना वो ज़ख़्म भर भी गए

अब्बास रिज़वी

धुआँ सा फैल गया दिल में शाम ढलते ही

अब्बास रिज़वी

अहल-ए-जुनूँ थे फ़स्ल-ए-बहाराँ के सर गए

अब्बास रिज़वी

लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है

अब्बास क़मर

हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं

अब्बास क़मर

हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है

अब्बास क़मर

अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए

अब्बास क़मर

ख़्वाब-गह में सियाह ख़ुशबू था

अब्बास कैफ़ी

तुम आके लौट गए फिर भी हो यहीं मौजूद

अब्बास दाना

है जिस्म सख़्त मगर दिल बहुत ही नाज़ुक है

अब्बास दाना

ज़र्फ़ से बढ़ के हो इतना नहीं माँगा जाता

अब्बास दाना

वही दर्द है वही बेबसी तिरे गाँव में मिरे शहर में

अब्बास दाना

उस की वफ़ा न मेरी वफ़ा का सवाल था

अब्बास दाना