Sad Poetry (page 167)
दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
देता था जो साया वो शजर काट रहा है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
बे-तअल्लुक़ सारे रिश्ते कौन किस का आश्ना
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
बदन पे ज़ख़्म सजाए लहू लबादा किया
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
अपनी तो कोई बात बनाए नहीं बनी
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
तुम्हारी याद का इक दायरा बनाती हूँ
बिल्क़ीस ख़ान
सौ सदियों का नौहा है
बिल्क़ीस ख़ान
रंग ले कर नया उदासी का
बिल्क़ीस ख़ान
करूँ क्या सख़्त मुश्किल आ पड़ी है
बिल्क़ीस ख़ान
हमारे दिल का न दर खटखटा परेशानी
बिल्क़ीस ख़ान
घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी
बिल्क़ीस ख़ान
दुश्मन ब-नाम-ए-दोस्त बनाना मुझे भी है
बिल्क़ीस ख़ान
रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में
बिलाल अहमद
एक काँटे की खटक से दिल मिरा आबाद था
बिलाल अहमद
अजीब क़ैद थी जिस में बहुत ख़ुशी थी मुझे
बिलाल अहमद
तड़ख़न
बिलाल अहमद
सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर
बिलाल अहमद
नास्टैल्जिया
बिलाल अहमद
मुश्किल
बिलाल अहमद
एक ख़्वाब
बिलाल अहमद
दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989
बिलाल अहमद
धुँद
बिलाल अहमद
ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी
बिलाल अहमद
तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं
बिलाल अहमद
रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में
बिलाल अहमद
इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई
बिलाल अहमद
जाम-ए-गदाई हाथ में ले नित सांज-सवेरे फिरते हैं
भूरे ख़ान आशुफ़्ता
मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है
भवेश दिलशाद
कैसी कैसी नहीं करता रहा मन-मानी मैं
भवेश दिलशाद
कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
भवेश दिलशाद