Sad Poetry (page 166)

ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर

बिर्ज लाल रअना

मोहब्बत नग़्मा भी है साज़ भी है

बिर्ज लाल रअना

ख़याल को ज़ौ नज़र को ताबिश नफ़स को रख़शंदगी मिलेगी

बिर्ज लाल रअना

दुनिया में वफ़ा-केश बशर ढूँढ रहा हूँ

बिर्ज लाल रअना

आरज़ूएँ नज़्र-ए-दौराँ नज़्र-ए-जानाँ हो गईं

बिर्ज लाल रअना

आप अपने रक़ीब हैं हम लोग

बिर्ज लाल रअना

वो: एक

बिमल कृष्ण अश्क

एआद-ए-हिकायतें

बिमल कृष्ण अश्क

यूँ न जान अश्क हमें जो गया बाना न मिला

बिमल कृष्ण अश्क

उन की गोद में सर रख कर जब आँसू आँसू रोया था

बिमल कृष्ण अश्क

तुझ जैसा इक आँचल चाहूँ अपने जैसा दामन ढूँडूँ

बिमल कृष्ण अश्क

कैसे कहें कि चार तरफ़ दायरा न था

बिमल कृष्ण अश्क

जो दिल में उस को बसाए वो और कुछ न करे

बिमल कृष्ण अश्क

जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था

बिमल कृष्ण अश्क

जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो

बिमल कृष्ण अश्क

ऐसे में रोज़ रोज़ कोई ढूँडता मुझे

बिमल कृष्ण अश्क

यही इक मश्ग़ला शाम-ओ-सहर है

बिल्क़ीस बेगम

क़ासिद तू ख़त को लाया है क्यूँकर खुला हुआ

बिल्क़ीस बेगम

आता है कोई लुत्फ़ का सामाँ लिए हुए

बिल्क़ीस बेगम

यूँ चुप रहा करे से तो हो जाए है जुनूँ

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

ख़ुद अपनी फ़िक्र उगाती है वहम के काँटे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

ज़ख़्म को फूल कहें नौहे को नग़्मा समझें

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

नज़र आता है वो जैसा नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

मिरी हथेली में लिक्खा हुआ दिखाई दे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

किस ने कहा किसी का कहा तुम किया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

काँटे हों या फूल अकेले चुनना होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब एक रंग में दुनिया का हाल ठहरा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हमारी जागती आँखों में ख़्वाब सा क्या था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन