Sad Poetry (page 165)
सहर हुई तो ख़यालों ने मुझ को घेर लिया
बिस्मिल साबरी
हैराँ हूँ कि अब लाऊँ कहाँ से मैं ज़बाँ और
बिस्मिल साबरी
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
बिस्मिल अज़ीमाबादी
एक दिन वो दिन थे रोने पे हँसा करते थे हम
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ये बुत फिर अब के बहुत सर उठा के बैठे हैं
बिस्मिल अज़ीमाबादी
तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सोचने का भी नहीं वक़्त मयस्सर मुझ को
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सारी उम्मीद रही जाती है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
रुख़ पे गेसू जो बिखर जाएँगे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
निगाह-ए-क़हर होगी या मोहब्बत की नज़र होगी
बिस्मिल अज़ीमाबादी
न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
मेरी दुआ कि ग़ैर पे उन की नज़र न हो
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ख़िज़ाँ जब तक चली जाती नहीं है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
कहाँ आया है दीवानों को तेरा कुछ क़रार अब तक
बिस्मिल अज़ीमाबादी
जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने
बिस्मिल अज़ीमाबादी
अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले
बिस्मिल अज़ीमाबादी
अब मुलाक़ात कहाँ शीशे से पैमाने से
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ये कैसी आग अभी ऐ शम्अ तेरे दिल में बाक़ी है
बिस्मिल इलाहाबादी
याद आता है समाँ मुझ को ख़ुद-आराई का
बिस्मिल इलाहाबादी
उन से कह दो कि इलाज-ए-दिल-ए-शैदा न करें
बिस्मिल इलाहाबादी
क़ाबिल-ए-शरह मिरा हाल-ए-दिल-ए-ज़ार न था
बिस्मिल इलाहाबादी
मिल चुका महफ़िल में अब लुत्फ़-ए-शकेबाई मुझे
बिस्मिल इलाहाबादी
जो न करना था किया जो कुछ न होना था हुआ
बिस्मिल इलाहाबादी
जीने वाला ये समझता नहीं सौदाई है
बिस्मिल इलाहाबादी
इतना भी न साक़ी होश रहा पी कर ये हमें मय-ख़ाना था
बिस्मिल इलाहाबादी
आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं
बिस्मिल इलाहाबादी
सब उम्र तो जारी नहीं रहता है सफ़र भी
बिस्मिल आग़ाई
क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है
बिशन नरायण दराबर