Sad Poetry (page 164)
सोज़-ए-फ़िराक़ दिल में छुपाए हुए हैं हम
बबल्स होरा सबा
शिकवा नसीब का न करे बार बार तू
बबल्स होरा सबा
मिरी ज़िंदगी है तन्हा तुम्हें कुछ असर तो होता
बबल्स होरा सबा
ख़ुशियाँ थीं बेवफ़ा न रहीं ज़िंदगी के साथ
बबल्स होरा सबा
ख़ुद को तमाशा ख़ूब बनाता रहा हूँ मैं
बबल्स होरा सबा
ख़ामुशी में क़यास मेरा है
बबल्स होरा सबा
जिस ने जाना जहाँ तमाशा है
बबल्स होरा सबा
जिस ने जाना जहाँ तमाशा है
बबल्स होरा सबा
बे-रुख़ी ने उस की कैसा ये इशारा कर दिया
बबल्स होरा सबा
सुलगती रेत में इक चेहरा आब सा चमका
बृजेश अम्बर
आसमाँ है समुंदर पे छाया हुआ
बृजेश अम्बर
ज़ौ-बार इसी सम्त हुए शम्स-ओ-क़मर भी
ब्रहमा नन्द जलीस
यही समझा हूँ बस इतनी हुई है आगही मुझ को
ब्रहमा नन्द जलीस
तुझ से तसव्वुरात में ऐ जान-ए-आरज़ू
ब्रहमा नन्द जलीस
पूछते हैं बज़्म में सुन कर वो अफ़्साना मिरा
ब्रहमा नन्द जलीस
मसर्रत को मसर्रत ग़म को जो बस ग़म समझते हैं
ब्रहमा नन्द जलीस
होती नहीं रसाई-ए-बर्क़-ए-तपाँ कहाँ
ब्रहमा नन्द जलीस
देने वाले ये ज़िंदगी दी है
ब्रहमा नन्द जलीस
दास्तान-ए-शमअ' थी या क़िस्सा-ए-परवाना था
ब्रहमा नन्द जलीस
ऐ 'जलीस' अब इक तुम्हीं में आदमियत हो तो हो
ब्रहमा नन्द जलीस
इस क़दर बढ़ गई वहशत तिरे दीवाने की
बूम मेरठी
अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर ए'जाज़ है
बूम मेरठी
अगर दुश्मन की थोड़ी सी मरम्मत और हो जाती
बूम मेरठी
किसी के सितम इस क़दर याद आए
बिस्मिल सईदी
वही होती है रहबर जो तमन्ना दिल में होती है
बिस्मिल सईदी
रह-रव-ए-राह-ए-मोहब्बत कौन सी मंज़िल में है
बिस्मिल सईदी
कौन समझे इश्क़ की दुश्वारियाँ
बिस्मिल सईदी
फ़राहम जिस क़दर इशरत के सामाँ होते जाते हैं
बिस्मिल सईदी
अब इश्क़ रहा न वो जुनूँ है
बिस्मिल सईदी
वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है
बिस्मिल साबरी