Sad Poetry (page 211)

जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया

अतीक़ इलाहाबादी

हम तो बिछड़ के रो लेते हैं

अतीक़ इलाहाबादी

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत

अतीक़ इलाहाबादी

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अतीक़ इलाहाबादी

शजर से मिल के जो रोने लगा था

अतीक़ अहमद

मैं अपनी सोचों में एक दरिया बना रहा था

अतीक़ अहमद

मैं अपनी ख़ाक को जब आइना बनाता हूँ

अतीक़ अहमद

वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने

अतीब एजाज़

गुमाँ के तन पे यक़ीं का लिबास रहने दो

अतीब एजाज़

दिल पे यादों का बोझ तारी है

अतीब एजाज़

बिखर बिखर गया इक मौज-ए-राएगाँ की तरह

अताउर्रहमान क़ाज़ी

तिलिस्म-ए-शब से बहुत बे-ख़बर चले आए

अताउर्रहमान क़ाज़ी

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

तिरी आँखों में इक मुबहम फ़साना ढूँढ ही लेगा

अताउर्रहमान जमील

शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए

अताउर्रहमान जमील

माना कि सितारे सर-ए-अफ़्लाक बहुत हैं

अताउर्रहमान जमील

कहाँ गए शब-ए-महताब के जमाल-ज़दा

अताउर्रहमान जमील

आँसू तुम्हारी आँख में आए तो उठ गए

अताउर्रहमान जमील

आज भी जिस की ख़ुश्बू से है मतवाली मतवाली रात

अताउर्रहमान जमील

वैसे तो इस घर को उस ने चाहे कम ख़ुश-हाली दी

अताउल हसन

तुम्हारे हिज्र का सदक़ा उतार फेंकता है

अताउल हसन

किसी और को मैं तिरे सिवा नहीं चाहता

अताउल हसन

दम-ब-दम एक साथ बैठे हैं

अताउल हसन

ये किस अज़ाब में उस ने फँसा दिया मुझ को

अताउल हक़ क़ासमी

दिलों से ख़ौफ़ निकलता नहीं अज़ाबों का

अताउल हक़ क़ासमी

एक फ़लर्ट लड़की

अताउल हक़ क़ासमी

वो दश्त-ए-कर्ब-ओ-बला में उतरने देता नहीं

अताउल हक़ क़ासमी

मंज़िलें भी ये शिकस्ता-बाल-ओ पर भी देखना

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी