Sad Poetry (page 212)

क्या क्या न प्यास जागे मिरे दिल के दश्त में

अता तुराब

हाँ तुझे भी तो मयस्सर नहीं तुझ सा कोई

अता तुराब

तन्हाइयों के दश्त में भागे जो रात भर

अता तुराब

रात वहशत से गुरेज़ाँ था मैं आहू की तरह

अता तुराब

मेहनत से मिल गया जो दफ़ीने के बीच था

अता तुराब

कहीं जमाल-पज़ीरी की हद नहीं रखता

अता तुराब

कब कहाँ क्या मिरे दिलदार उठा लाएँगे

अता तुराब

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

अता शाद

दिल वो सहरा है जहाँ हसरत-ए-साया भी नहीं

अता शाद

दर्द की धूप में सहरा की तरह साथ रहे

अता शाद

ज़िंदगी आईना है आईना-आराई है

अता शाद

यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए

अता शाद

पारसाओं ने बड़े ज़र्फ़ का इज़हार किया

अता शाद

गहरी है शब की आँच कि ज़ंजीर-ए-दर कटे

अता शाद

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

अता शाद

चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए

अता शाद

चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए

अता शाद

बड़ा कठिन है रास्ता जो आ सको तो साथ दो

अता शाद

ढला जो दिन तो गया नूर-ए-आफ़्ताब भी साथ

अता हुसैन कलीम

तीरगी शम्अ बनी राहगुज़र में आई

अता आबिदी

सर पे सूरज हो मगर साया न हो ऐसा न था

अता आबिदी

साँसों के तआक़ुब में हैरान मिली दुनिया

अता आबिदी

पस-ए-दीवार हुज्जत किस लिए है

अता आबिदी

कोई भी ख़ुश नहीं है इस ख़बर से

अता आबिदी

जागते ही नज़र अख़बार में खो जाती है

अता आबिदी

रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते

असरार-उल-हक़ मजाज़

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद

असरार-उल-हक़ मजाज़

मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो

असरार-उल-हक़ मजाज़

क्यूँ जवानी की मुझे याद आई

असरार-उल-हक़ मजाज़

हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ

असरार-उल-हक़ मजाज़